शनिवार, 23 अगस्त 2014
खुराक में छुपा सेहत का राज
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पृथ्वी पर हर तरह की जिंदगी समय के साथ बूढ़ी होती है और फिर खत्म हो जाती है. लेकिन क्या बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा और ज्यादा सेहतमंद बनाया जा सकता है. जर्मनी में कई भारतीय वैज्ञानिक इसी पर रिसर्च कर रहे हैं.
पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में अपनों को पहचानने की कोशिश करती रेनाटे क्लोट्स. वो बुढ़ापे में सामने आने वाली दिमागी बीमारी अल्जाइमर से लड़ रही हैं. उनके दिमाग के कोशिशकाएं धीरे धीरे खत्म हो रही हैं. इसका पहला असर उनकी यादाश्त पर पड़ता है. धीरे धीरे पूरा दिमाग खत्म होने लगता है.
अल्जाइमर से अब तक न तो कोई मरीज जीत पाया है और न ही मेडिकल साइंस. आम तौर पर बुढ़ापे में कैंसर, कार्डियोवैस्कुलर और न्यूरोडिजेनेरेटिव बीमारियां सामने आती हैं.
क्या है बुढ़ापा
जर्मनी के कोलोन शहर में माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजी ऑफ एजिंग में बुढ़ापे से जुड़ी समस्याओं पर रिसर्च हो रही है. आंचल श्रीवास्तव चूहों और फ्रूट फ्लाई कही जाने वाली मक्खियों के जरिेए समझने की कोशिश कर रही हैं कि बुढ़ापा शरीर को कैसे खत्म करता है. फ्रूट फ्लाई ऐसी छोटी मक्खियां हैं जो सड़ते फलों पर मंडराती हैं. ऐसी मक्खियों का जीवनकाल 60 से 80 दिन के बीच होता है. आंचल के मुताबिक लैब में इन मक्खियों के सहारे बुढ़ापे के कई संकेत दिखाई पड़ते हैं. ऐसा ही इंसानों में भी होता है, "समय के साथ हमारी कोशिकाएं विघटित होती हैं. हमारी मेटाबॉलिज्म उतनी इफेक्टिव नहीं रह जाती है और हमारा रोग प्रतिरोधी तंत्र कमजोर हो जाता है. हमारे अंगों के मूलभूत तंत्र में कोशिकाओं के बीच आपसी संवाद चलता है, ये कमजोर पड़ जाता है. इन सबका नतीजा यह होता है कि पूरे का पूरा इंसानी शरीर कमजोर होने लगता है और आगे चलकर मौत आती है. इसी को एजिंग कहते हैं."
व्यवहार बदलता बुढ़ापा
इंस्टीट्यूट में ही चिराग जैन लैब में फ्रूट फ्लाई पर अलग अलग किस्म के खाने और तापमान के असर पर परीक्षण कर रहे हैं. आम तौर पर ये मक्खियां नेगेटिव जियोटैक्सिस की वजह से गुरुत्व बल के उलट, ऊपर की तरफ जाती है. लेकिन अगर वो ऐसा न करें तो, "इसका मतलब यह हो सकता है कि फ्लाइज में उम्र से संबंधित कोई गड़बड़ी है. ये गड़बड़ी क्या है. हमें जाहिर तौर पर पता है कि ऊपर चढ़ने के लिए मांस पेशियों की जरूरत होती है और अगर उनकी चढ़ाई की क्षमता में कोई दिक्कत है तो इसका मतलब है कि उनकी मांसपेशियां विघटित होना शुरू हो गई हैं."
उम्मीद की किरण
यहीं रिसर्च करने वाले वर्णेश टिक्कू के मुताबिक रेंगने वाले कीड़ों से लेकर इंसानों तक में बुढ़ापा, कई एक जैसे बदलाव लाता है. स्लाइड में बायीं तरफ बुजुर्ग कीड़ा है तो दूसरी तरफ सेहतमंद. वर्णेश कहते हैं, "हम अलग अलग तरह के ऑर्गेनिज्म्स स्टडी कर चुके हैं और कुछ ऐसे जीन्स, कुछ ऐसे पाथवेज मिले हैं जो हर प्रजाति में मिलते हैं. इसका अहम उदाहरण इंसुलिन सिग्नलिंग पाथवे है जो कीड़ों से लेकर स्तनधारियों में पाया जाता है. हमने हर एक सिस्टम में स्टडी किया है, और हर एक सिस्टम से हमें सबूत मिला है कि ये एजिंग रेगुलेट, लाइफस्पैन रेगुलेट करता है."
कम खाएं, बढ़िया खाएं
फलों, रंग बिरंगी सब्जियों, दूध और दही से हमें आसानी से विटामिन, प्रोटीन, एंटी ऑक्सीडेंट्स, मिनरल्स, मार्कोमिनरल्स, फैटी एसिड, फैट, फाइबर और कार्बोहाइड्रेट जैसी पौष्टिक चीजें मिलती हैं और ये हमारे स्वास्थ्य में बड़ी भूमिका निभाती हैं.
सीनियर रिसर्चर सेबास्टियान ग्रोनके के मुताबिक कम मात्रा में खाना लेकिन पौष्टिक आहार लेना उम्र के असर को टालने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाता है, "बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन कुछ ऐसे शोध हुए हैं जो शारीरिक श्रम की भूमिका के बारे में बताते हैं, लेकिन लंबी उम्र के साथ इनका बहुत करीबी रिश्ता सामने नहीं आया है. हालांकि कसरत करने से जिदंगी सेहतमंद रहती है. प्रयोगशाला के माहौल में देखा गया है कि लंबी जिंदगी में पोषक तत्वों की बड़ी भूमिका होती है. तो मैं कह सकता हूं कि पोषक तत्वों की भूमिका कसरत से ज्यादा है. लेकिन सबसे अच्छा संतुलन यह है कि पोषक तत्वों वाली खुराक और कुछ कसरत."
कम लेकिन पौष्टिक खाना और हर दिन समय निकालकर थोड़ी बहुत कसरत, डायबिटीज, दिल और दिमागी बीमारियों को दूर रखने में खासी भूमिका निभाते हैं. फैसला अब आपका है कि आप कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं या फिर सेहतमंद जिंदगी के साथ आगे बढ़ते हैं.
रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी
संपादन: महेश झा
sabhar:http://www.dw.de/
शुक्रवार, 22 अगस्त 2014
जब दिव्य शक्तियां मिलने लगती हैं तब ऐसे अनुभव होते हैं
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अगस्त 22, 2014 in जब दिव्य शक्तियां मिलने लगती हैं तब ऐसे अनुभव होते हैं

साधना या सामान्य स्थिति में होने वाले आध्यात्मिक अनुभवों का जिक्र औरों से करना नैतिक दृष्टि से तो गलत है ही, उससे ज्यादा आध्यात्मिक लिहाज से भी नुकसान देह है। योग और भक्तिमार्ग का अध्ययन और प्रयोग कर रही जर्मन साधिका वंदना प्रभुदासी (मूलनाम एडलिना अल्फ्रेड) का कहना है कि साधना के लिहाज से नैतिकता का मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है।
महत्वपूर्ण यह है कि आप साधना के मार्ग पर कैसे चल रह हैं। इसीलिए किसी अनुभवी गुरु या साधक के संगी साथी का परामर्श उपयोगी साबित होता है।
साथ साधना कर रहे व्यक्तियों के अनुभवों का जिक्र करते हुए एडलिना ने शुरुआती दस अनुभव ऐसे बताए हैं जो अध्यात्म मार्ग पर बढ़ने के सूचक भी हो सकते हैं और किसी विकार के लक्षण भी। इन अनुभवों में ध्यान के समय भौहों के बीच पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है।
शरीर के निचले हिस्से पर जहां रीढ की हड्डी शुरु होती है, स्पंदन का अनुभव, सिर में शिखास्थान पर चींटियां चलने जैसा लगना, कपाल ऊपर की तरफ खिंचने जैसा लगना आदि भी इसी तरह के अनुभव है।
ऋषिकेश के एक आश्रम में 1980 के आसपास गुरु के सान्निध्य में साधना करती रही एडलिना ने एक अनुभव का जिक्र किया। गुरु एक साधारण संन्यासी थे। उनके पास साधक स्तर के लोग ही आते थे। एडलिना या वंदना प्रभुदासी उनकी कुटिया से करीब तीन किलोमीटर दूर पर ठहरी हुई थी। साधना के दौरान अनुभव हुआ कि मेरुदंड के पास आथार केंद्र में भंवर की गति से कोई शक्ति हिलोरें ले रही है।
कोई तीन सप्ताह तक ध्यान के समय ऐसा अनुभव होता रहा। एडलिना को लगा कि यह साधना में सफल होते जाने का लक्षण है। और साधकों, सिद्घों और योगग्रंथों में भी ऐसा पढ़ा था। गुरु से इस अनुभव का जिक्र किया तो उन्होंने कुछ सेकंडों तक आंखो में झांका और कहा कि यह वात विकार है बेटी। औषधि उपचार से ठीक हो जाएगा। एडलिना को इससे थोड़ी निराशा तो हुई पर गुरु ने जो कहा था, वह सही पाया।
वाकई में उपचार के बाद एडलिना की शिकायत दूर हो गई। नए साधको का सावझान करते हुए एडलिना का कहना है किसी भी अनुभूति पर पुस्तकों के आधार पर या अपने आप निर्णय लेने से बचना चाहिए। बेहतर है कि गुरु के बताए साधन को किया जाते रहे। अच्छे बुरे जो भी अनुभव हों उन्हें किसी अनुभवी साधक या गुरु को ही बताएं। उनसे मदद लें। यह सुविधा नहीं मिल रही हो तो चुपचाप योग भक्ति का अभ्यास करते रहें। sabhar :http://www.amarujala.com/
साधना या सामान्य स्थिति में होने वाले आध्यात्मिक अनुभवों का जिक्र औरों से करना नैतिक दृष्टि से तो गलत है ही, उससे ज्यादा आध्यात्मिक लिहाज से भी नुकसान देह है। योग और भक्तिमार्ग का अध्ययन और प्रयोग कर रही जर्मन साधिका वंदना प्रभुदासी (मूलनाम एडलिना अल्फ्रेड) का कहना है कि साधना के लिहाज से नैतिकता का मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है।
महत्वपूर्ण यह है कि आप साधना के मार्ग पर कैसे चल रह हैं। इसीलिए किसी अनुभवी गुरु या साधक के संगी साथी का परामर्श उपयोगी साबित होता है।
साथ साधना कर रहे व्यक्तियों के अनुभवों का जिक्र करते हुए एडलिना ने शुरुआती दस अनुभव ऐसे बताए हैं जो अध्यात्म मार्ग पर बढ़ने के सूचक भी हो सकते हैं और किसी विकार के लक्षण भी। इन अनुभवों में ध्यान के समय भौहों के बीच पहले काला और फिर नीला रंग दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है।
शरीर के निचले हिस्से पर जहां रीढ की हड्डी शुरु होती है, स्पंदन का अनुभव, सिर में शिखास्थान पर चींटियां चलने जैसा लगना, कपाल ऊपर की तरफ खिंचने जैसा लगना आदि भी इसी तरह के अनुभव है।
ऋषिकेश के एक आश्रम में 1980 के आसपास गुरु के सान्निध्य में साधना करती रही एडलिना ने एक अनुभव का जिक्र किया। गुरु एक साधारण संन्यासी थे। उनके पास साधक स्तर के लोग ही आते थे। एडलिना या वंदना प्रभुदासी उनकी कुटिया से करीब तीन किलोमीटर दूर पर ठहरी हुई थी। साधना के दौरान अनुभव हुआ कि मेरुदंड के पास आथार केंद्र में भंवर की गति से कोई शक्ति हिलोरें ले रही है।
कोई तीन सप्ताह तक ध्यान के समय ऐसा अनुभव होता रहा। एडलिना को लगा कि यह साधना में सफल होते जाने का लक्षण है। और साधकों, सिद्घों और योगग्रंथों में भी ऐसा पढ़ा था। गुरु से इस अनुभव का जिक्र किया तो उन्होंने कुछ सेकंडों तक आंखो में झांका और कहा कि यह वात विकार है बेटी। औषधि उपचार से ठीक हो जाएगा। एडलिना को इससे थोड़ी निराशा तो हुई पर गुरु ने जो कहा था, वह सही पाया।
वाकई में उपचार के बाद एडलिना की शिकायत दूर हो गई। नए साधको का सावझान करते हुए एडलिना का कहना है किसी भी अनुभूति पर पुस्तकों के आधार पर या अपने आप निर्णय लेने से बचना चाहिए। बेहतर है कि गुरु के बताए साधन को किया जाते रहे। अच्छे बुरे जो भी अनुभव हों उन्हें किसी अनुभवी साधक या गुरु को ही बताएं। उनसे मदद लें। यह सुविधा नहीं मिल रही हो तो चुपचाप योग भक्ति का अभ्यास करते रहें। sabhar :http://www.amarujala.com/
ये है 'अद्भुत बाबा', 25 साल से साधु बन कर रहा था लड़की सप्लाई और तस्करी
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अगस्त 22, 2014 in 25 साल से साधु बन कर रहा था लड़की सप्लाई और तस्करी, ये है 'अद्भुत बाबा'

उदयपुर. शहर में पिछले 25 साल से साधु बनकर रह रहा एक शख्स मूिर्त तस्कर और लड़कियों का सप्लायर निकला। सुखेर थाना पुलिस और स्पेशल सेल ने गुरुवार को उसे कैलाशपुरी में श्री जैन श्वेतांबर मंदिर स्थित आश्रम से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी के आश्रम से 48 प्राचीन मूर्तियां बरामद की गई हैं। इसके अलावा एक एयरगन, नकली कार्बाइन और लड़कियों के कपड़े व मेकअप की सामग्री भी मिली है। सुखेर एसएचओ हरेन्द्र सिंह ने बताया कि आरोपी बाबा मूलत: इन्द्रगंज, ग्वालियर का रहने वाला है। इसका असली नाम नरेन्द्र (60) पुत्र गुमान मल बच्छावत (जैन) है।
यहां खुद को रत्नम बच्छावत, रत्नसूरी बाबा और अद्भुत बाबा के नाम से भी प्रचारित कर रखा था। मूर्ति चोरी कर विदेशों में तस्करी करवाता था। प्राचीन मूर्तियों के चोरी के मामले में आरोपी नरेन्द्र को आईपीसी की धारा 379,411 और पुरातत्व वस्तु संरक्षण अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया है। आरोपी को 28 अगस्त तक रिमांड पर भेज दिया है। इसके खिलाफ सुखेर, अंबामाता, भूपालपुरा थानों सहित उदयपुर में सात आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन्द्रगंज, ग्वालियर में भी यह वांटेड है। मूर्ति चोरी के मामले में दिल्ली में भी एफआईआर दर्ज है। साथ रहने वाली महिला जूली अभी फरार है। माना जा रहा है कि ये महिला लड़कियों को लाती थी।
भेष साधु का, कारनामे काले
लड़कियों की तस्करी का शक
खुफिया पुलिस के अनुसार ग्रामीणों की सूचना और प्रारंभिक सबूतों से लड़कियों की तस्करी होने का भी शक है। आरोपी के यहां आने वाली अधिकांश लड़कियां बांसवाड़ा जिले की हैं। यहां इनकी अश्लील क्लिपिंग बनाई जाती थी। इस रैकेट में जूली नाम की महिला का नाम आ रहा है।
आश्रम में शानोशौकत की चीजें
25 साल पहले जब यहां आया था तब रात गुजारने के लिए जगह नहीं होने से ग्रामीणों ने इसे यहां एक रात रहने दिया। इसके बाद उसी देवस्थान विभाग के प्राचीन श्री जैन मंदिर पर इसने कब्जा कर अद्भुतगिरी आश्रम बना लिया। इस आलीशान आश्रम में एेशोआराम की सारी चीजें मिली। बाबा महंगे मोबाइल का कलेक्शन रखता था और 10 कुत्ते पाल रखे थे। आश्रम के ऊपर 28 सौ वर्ष प्राचीन श्री जैन श्वेतांबर अद्भुत जी तीर्थ लिखा है। इसी नाम से सेवा संस्थान बनाया हुआ है। आश्रम जीर्णोद्धार के नाम से करोड़ाें रुपए का चंदा भी उठाया। उपसरपंच अशोक कुमार ने बताया कि बाबा के कई अफसरों और रसूखदारों से संपर्क थे। तभी इसके खिलाफ अब तक कार्रवाई नहीं की।
दो एयरगन व आईपेड भी मिला
आश्रम से डबल डोर का फ्रीज, सूटकेस, दीवान मिले। महिलाआें के वस्त्र और प्रसाधनयुक्त सामान भी मिले। हिसाब के रजिस्टर, अंगूठा लगा खाली स्टांप, एफआईआर की कॉपी, ताम्रपत्र, खंजर और दो एयरगन मिली, जिनमें एक नकली कार्बाइन थी। मंदिर पर देवस्थान की ओर से माना गमेती के नाम से चौकीदार लगा हुआ था उससे पूछताछ की जा रही है।
ग्वालियर में नहीं मिला रिकॉर्ड, बाबा ने सिंधिया परिवार से नाता बता बनाए भक्त
मूर्ति तस्करी के मामले में पकड़े गए साधु बने नरेंद्र ने सिंधिया घराने से नाता बताने वाला पोस्टर लगाकर प्रचार किया। मारवाड़ क्षेत्र से अनुयायी बना लिए। हर रोज करीब 20 लोग मंदिर में पूजा के लिए आने लगे। यह भी प्रचारित किया कि ग्वालियर के दीवान राय बहादुर सोहनराव सिंधिया उसके पिता थे। खुद को राजनीति से जुड़ा हुआ भी बताता था। पुलिसनेबताया कि आरोपी जिले और संभाग के प्राचीन मंदिरों में जाकर रैकी करता था। इसके बाद उदयपुर में काम करने वाले यूपी, बिहारी मजदूरों से चोरी करवाता और बख्शीश देता था। और मौका लगते ही विदेशों में तस्करी के लिए भेज देता था।
बड़े तस्करों से संबंध का शक
पुलिस को शक है कि आरोपी के कुख्यात मूर्ति तस्करों से भी तार जुड़े हो सकते हैं। आरोपी प्राचीन मंदिरों में पहले रैकी करता था। फिर मजदूरों को पैसे देकर मूर्ति चोरी करवाता। मूर्तियों को पहले आश्रम फिर मौका मिलते ही विदेश भेज देता था। आरोपी पर उदयपुर में मारपीट-धोखाधड़ी से जुड़े सात आपराधिक मामले दर्ज हैं। ग्वालियर में भी यह वांटेड है। मूर्ति चोरी मामले में दिल्ली में भी उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज है।
नरेंद्र का रिकॉर्ड तलाशने के लिए उदयपुर पुलिस ने इंदरगंज थाने की पुलिस से संपर्क किया था लेकिन यहां पर उसका रिकॉर्ड नहीं मिला। टीआई इंदरगंज अमर सिंह के अनुसार उदयपुर के पुलिस अफसरों ने बताया था कि नरेंद्र 1973 में एक युवती को बहला फुसलाकर ले गया था। इस आधार पर उसका रिकॉर्ड तलाश किया गया था लेकिन फिलहाल इसका रिकॉर्ड नहीं मिला है।






आरोपी बाबा को था कुत्ते पालने का शौक। आश्रम के बाहर मिले जो अलग अलग नसल के कुत्ते।

(आरोपी बाबा के आश्रम के कमरे में लगा मिला एलसीडी।)
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उदयपुर. शहर में पिछले 25 साल से साधु बनकर रह रहा एक शख्स मूिर्त तस्कर और लड़कियों का सप्लायर निकला। सुखेर थाना पुलिस और स्पेशल सेल ने गुरुवार को उसे कैलाशपुरी में श्री जैन श्वेतांबर मंदिर स्थित आश्रम से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी के आश्रम से 48 प्राचीन मूर्तियां बरामद की गई हैं। इसके अलावा एक एयरगन, नकली कार्बाइन और लड़कियों के कपड़े व मेकअप की सामग्री भी मिली है। सुखेर एसएचओ हरेन्द्र सिंह ने बताया कि आरोपी बाबा मूलत: इन्द्रगंज, ग्वालियर का रहने वाला है। इसका असली नाम नरेन्द्र (60) पुत्र गुमान मल बच्छावत (जैन) है।
यहां खुद को रत्नम बच्छावत, रत्नसूरी बाबा और अद्भुत बाबा के नाम से भी प्रचारित कर रखा था। मूर्ति चोरी कर विदेशों में तस्करी करवाता था। प्राचीन मूर्तियों के चोरी के मामले में आरोपी नरेन्द्र को आईपीसी की धारा 379,411 और पुरातत्व वस्तु संरक्षण अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया है। आरोपी को 28 अगस्त तक रिमांड पर भेज दिया है। इसके खिलाफ सुखेर, अंबामाता, भूपालपुरा थानों सहित उदयपुर में सात आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन्द्रगंज, ग्वालियर में भी यह वांटेड है। मूर्ति चोरी के मामले में दिल्ली में भी एफआईआर दर्ज है। साथ रहने वाली महिला जूली अभी फरार है। माना जा रहा है कि ये महिला लड़कियों को लाती थी।
भेष साधु का, कारनामे काले
लड़कियों की तस्करी का शक
खुफिया पुलिस के अनुसार ग्रामीणों की सूचना और प्रारंभिक सबूतों से लड़कियों की तस्करी होने का भी शक है। आरोपी के यहां आने वाली अधिकांश लड़कियां बांसवाड़ा जिले की हैं। यहां इनकी अश्लील क्लिपिंग बनाई जाती थी। इस रैकेट में जूली नाम की महिला का नाम आ रहा है।
आश्रम में शानोशौकत की चीजें
25 साल पहले जब यहां आया था तब रात गुजारने के लिए जगह नहीं होने से ग्रामीणों ने इसे यहां एक रात रहने दिया। इसके बाद उसी देवस्थान विभाग के प्राचीन श्री जैन मंदिर पर इसने कब्जा कर अद्भुतगिरी आश्रम बना लिया। इस आलीशान आश्रम में एेशोआराम की सारी चीजें मिली। बाबा महंगे मोबाइल का कलेक्शन रखता था और 10 कुत्ते पाल रखे थे। आश्रम के ऊपर 28 सौ वर्ष प्राचीन श्री जैन श्वेतांबर अद्भुत जी तीर्थ लिखा है। इसी नाम से सेवा संस्थान बनाया हुआ है। आश्रम जीर्णोद्धार के नाम से करोड़ाें रुपए का चंदा भी उठाया। उपसरपंच अशोक कुमार ने बताया कि बाबा के कई अफसरों और रसूखदारों से संपर्क थे। तभी इसके खिलाफ अब तक कार्रवाई नहीं की।
दो एयरगन व आईपेड भी मिला
आश्रम से डबल डोर का फ्रीज, सूटकेस, दीवान मिले। महिलाआें के वस्त्र और प्रसाधनयुक्त सामान भी मिले। हिसाब के रजिस्टर, अंगूठा लगा खाली स्टांप, एफआईआर की कॉपी, ताम्रपत्र, खंजर और दो एयरगन मिली, जिनमें एक नकली कार्बाइन थी। मंदिर पर देवस्थान की ओर से माना गमेती के नाम से चौकीदार लगा हुआ था उससे पूछताछ की जा रही है।
ग्वालियर में नहीं मिला रिकॉर्ड, बाबा ने सिंधिया परिवार से नाता बता बनाए भक्त
मूर्ति तस्करी के मामले में पकड़े गए साधु बने नरेंद्र ने सिंधिया घराने से नाता बताने वाला पोस्टर लगाकर प्रचार किया। मारवाड़ क्षेत्र से अनुयायी बना लिए। हर रोज करीब 20 लोग मंदिर में पूजा के लिए आने लगे। यह भी प्रचारित किया कि ग्वालियर के दीवान राय बहादुर सोहनराव सिंधिया उसके पिता थे। खुद को राजनीति से जुड़ा हुआ भी बताता था। पुलिसनेबताया कि आरोपी जिले और संभाग के प्राचीन मंदिरों में जाकर रैकी करता था। इसके बाद उदयपुर में काम करने वाले यूपी, बिहारी मजदूरों से चोरी करवाता और बख्शीश देता था। और मौका लगते ही विदेशों में तस्करी के लिए भेज देता था।
बड़े तस्करों से संबंध का शक
पुलिस को शक है कि आरोपी के कुख्यात मूर्ति तस्करों से भी तार जुड़े हो सकते हैं। आरोपी प्राचीन मंदिरों में पहले रैकी करता था। फिर मजदूरों को पैसे देकर मूर्ति चोरी करवाता। मूर्तियों को पहले आश्रम फिर मौका मिलते ही विदेश भेज देता था। आरोपी पर उदयपुर में मारपीट-धोखाधड़ी से जुड़े सात आपराधिक मामले दर्ज हैं। ग्वालियर में भी यह वांटेड है। मूर्ति चोरी मामले में दिल्ली में भी उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज है।
नरेंद्र का रिकॉर्ड तलाशने के लिए उदयपुर पुलिस ने इंदरगंज थाने की पुलिस से संपर्क किया था लेकिन यहां पर उसका रिकॉर्ड नहीं मिला। टीआई इंदरगंज अमर सिंह के अनुसार उदयपुर के पुलिस अफसरों ने बताया था कि नरेंद्र 1973 में एक युवती को बहला फुसलाकर ले गया था। इस आधार पर उसका रिकॉर्ड तलाश किया गया था लेकिन फिलहाल इसका रिकॉर्ड नहीं मिला है।
आरोपी बाबा को था कुत्ते पालने का शौक। आश्रम के बाहर मिले जो अलग अलग नसल के कुत्ते।
(आरोपी बाबा के आश्रम के कमरे में लगा मिला एलसीडी।)
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गुरुवार, 21 अगस्त 2014
योग के इस फायदे पर कभी आपने गौर नहीं किया होगा
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अगस्त 21, 2014 in योग के इस फायदे पर कभी आपने गौर नहीं किया होगा
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती
एक माली के पास एक छोटा-सा जमीन का टुकड़ा है। भूमि बंजर है। वह उसे एक सुंदर बगीचे में तब्दील करना चाहता है। क्या करना होगा? क्या केवल बीज बो कर माली की यह आशा फलीभूत होगी कि एक दिन ये बीज पौधे की शक्ल लेंगे और उन पर फल-फूल लगेंगे?

या फिर उसको पहले भूमि को तैयार करना होगा, मोथे निकालने होंगे, कंकड़-पत्थर निकालने होंगे, भूमि को जोतना होगा और जब भूमि तैयार हो जाए तब बीच बोने होंगे तथा उसकी देखभाल तब तक करनी होगी, जब तक कि उसमें फल-फूल न लगने लग जाए? जब एक माली अपनी पसंद का बगीचा बनाने के लिए इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजर सकता है, तो हम बागवानी की इस विचारधारा को अपने जीवन में क्यों नहीं उतार सकते?
यदि आप अपने जीवन रूपी बगीचे के माली बन जाएं तो आपके जीवन की प्रसुप्त क्षमताएं अपने आप जागृत होने लगेंगी। इसलिए कि सारी क्षमताएं हमारे भीतर हैं। उन्हें प्रकट होने के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा है। हमें अपने आपको यह अवसर प्रदान करना है। हमलोग अपने जीवन में जो भाग-दौड़ करते हैं, उसका प्रयोजन क्या रहता है?
यही न कि हमें समृद्धि मिले, हम अधिक सुरक्षित हों, हम समाज में और नाम कमा सकें, समाज के उत्थान और निर्माण में एक सकारात्मक भूमिका निभा सकें आदि आदि। मनुष्य का जो भी प्रयास, जो भी कर्म होता है, उसके पीछे यही उद्देश्य होता है – नाम, यश, प्रसन्नता, सुख-संपत्ति, समृद्धि और शांति।
जन्म से मृत्यु तक हम इन्हीं की कामना करते हैं। पर इसके कारण हम लोगों की जो मानसिकता बन जाती है, वही हम लोगों के मनोविकास में बाधक सिद्ध होती है। मनुष्य का मनोविकास योग का आधार है। मनोविकास की प्रक्रिया की शिक्षा हमें योग में प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया का संबंध हमारे व्यावहारिक, सामाजिक और भौतिक जीवन के साथ है।
हमें अपने मन को एक खेत के रूप में देखना होगा, जहां हम काम कर सकते हैं। योग शुरू से ही यह कहता आया है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए मन पर ध्यान केंद्रित करना होगा। यह हमारी शरीर रूपी गाड़ी का इंजन है। जिस प्रकार एक कार इंजन के बिना नहीं चल सकती, उसकी प्रकार यदि इस जीवन का मार्ग-दर्शक मन न हो तो यह जीवन बेकार हो जाता है।
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार मन की क्षमताओं को व्यवस्थित करना तथा उनका विकास योग का लक्ष्य हो जाता है। यदि मन को केंद्रित, प्रेरित और एकाग्र न किया जाए और उसे सकारात्मक न बनाया जाए तो वह नकारात्मक जालों में फंस जाता है। इसलिए जीवन रूपी बगीचे से घास-फूस को निकालना ही योग की प्रक्रिया है।
आधुनिक यौगिक व तांत्रिक पुनर्जागरण के प्रेरणास्रोत संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी और विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय व विश्व योगपीठ के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती प्रवचन पर आधारित आलेख।
प्रस्तुति
किशोर कुमार sabhar :http://www.amarujala.com/
या फिर उसको पहले भूमि को तैयार करना होगा, मोथे निकालने होंगे, कंकड़-पत्थर निकालने होंगे, भूमि को जोतना होगा और जब भूमि तैयार हो जाए तब बीच बोने होंगे तथा उसकी देखभाल तब तक करनी होगी, जब तक कि उसमें फल-फूल न लगने लग जाए? जब एक माली अपनी पसंद का बगीचा बनाने के लिए इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजर सकता है, तो हम बागवानी की इस विचारधारा को अपने जीवन में क्यों नहीं उतार सकते?
यदि आप अपने जीवन रूपी बगीचे के माली बन जाएं तो आपके जीवन की प्रसुप्त क्षमताएं अपने आप जागृत होने लगेंगी। इसलिए कि सारी क्षमताएं हमारे भीतर हैं। उन्हें प्रकट होने के उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा है। हमें अपने आपको यह अवसर प्रदान करना है। हमलोग अपने जीवन में जो भाग-दौड़ करते हैं, उसका प्रयोजन क्या रहता है?
यही न कि हमें समृद्धि मिले, हम अधिक सुरक्षित हों, हम समाज में और नाम कमा सकें, समाज के उत्थान और निर्माण में एक सकारात्मक भूमिका निभा सकें आदि आदि। मनुष्य का जो भी प्रयास, जो भी कर्म होता है, उसके पीछे यही उद्देश्य होता है – नाम, यश, प्रसन्नता, सुख-संपत्ति, समृद्धि और शांति।
जन्म से मृत्यु तक हम इन्हीं की कामना करते हैं। पर इसके कारण हम लोगों की जो मानसिकता बन जाती है, वही हम लोगों के मनोविकास में बाधक सिद्ध होती है। मनुष्य का मनोविकास योग का आधार है। मनोविकास की प्रक्रिया की शिक्षा हमें योग में प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया का संबंध हमारे व्यावहारिक, सामाजिक और भौतिक जीवन के साथ है।
हमें अपने मन को एक खेत के रूप में देखना होगा, जहां हम काम कर सकते हैं। योग शुरू से ही यह कहता आया है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए मन पर ध्यान केंद्रित करना होगा। यह हमारी शरीर रूपी गाड़ी का इंजन है। जिस प्रकार एक कार इंजन के बिना नहीं चल सकती, उसकी प्रकार यदि इस जीवन का मार्ग-दर्शक मन न हो तो यह जीवन बेकार हो जाता है।
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार मन की क्षमताओं को व्यवस्थित करना तथा उनका विकास योग का लक्ष्य हो जाता है। यदि मन को केंद्रित, प्रेरित और एकाग्र न किया जाए और उसे सकारात्मक न बनाया जाए तो वह नकारात्मक जालों में फंस जाता है। इसलिए जीवन रूपी बगीचे से घास-फूस को निकालना ही योग की प्रक्रिया है।
आधुनिक यौगिक व तांत्रिक पुनर्जागरण के प्रेरणास्रोत संत परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी और विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय व विश्व योगपीठ के परमाचार्य स्वामी निरंजनानंद सरस्वती प्रवचन पर आधारित आलेख।
प्रस्तुति
किशोर कुमार sabhar :http://www.amarujala.com/
क्या आप जानते हैं आपका शरीर आपकी आत्मा का बच्चा है
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अगस्त 21, 2014 in क्या आप जानते हैं आपका शरीर आपकी आत्मा का बच्चा है
बी के एस आयंगर
ज्यादातर लोग यही चाहते हैं कि उनका शरीर उन्हें कोई तकलीफ न दे। अगर उन्हें कोई रोग या कष्ट न हो, तो वे स्वयं को स्वस्थ समझते हैं। वे इस बात से अनजान रहते हैं कि शरीर और मस्तिष्क के बीच का असंतुलन अंततः उन्हें बीमार बना देगा। योग का स्वास्थ्य पर तीन गुना असर होता है। यह लोगों को स्वस्थ रखता है, रोगों को पनपने नहीं देता और बीमार व्यक्तियों को स्वस्थ बनाता है।
लेकिन बीमारियां केवल शारीरिक नहीं होतीं। हर वह चीज, जो आपके आध्यात्मिक जीवन और व्यवहार को अव्यवस्थित करता है, बीमारी है। भले ही वह तत्काल बीमारी न लगे, पर अंततः वह बीमारी के रूप में ही प्रकट होगा। चूंकि ज्यादातर आधुनिक लोगों ने अपने मस्तिष्क को अपने शरीर से अलग मान लिया है, इसलिए उनकी आत्मा उनके सामान्य जीवन से निर्वासित हो गई है। वे भूल जाते हैं कि शरीर, मन और आत्मा, तीनों की तंदुरुस्ती हमारी मांसपेशियों के तंतुओं की तरह आपस में घनिष्ठता से जुड़ी होती हैं।
लेकिन बीमारियां केवल शारीरिक नहीं होतीं। हर वह चीज, जो आपके आध्यात्मिक जीवन और व्यवहार को अव्यवस्थित करता है, बीमारी है। भले ही वह तत्काल बीमारी न लगे, पर अंततः वह बीमारी के रूप में ही प्रकट होगा। चूंकि ज्यादातर आधुनिक लोगों ने अपने मस्तिष्क को अपने शरीर से अलग मान लिया है, इसलिए उनकी आत्मा उनके सामान्य जीवन से निर्वासित हो गई है। वे भूल जाते हैं कि शरीर, मन और आत्मा, तीनों की तंदुरुस्ती हमारी मांसपेशियों के तंतुओं की तरह आपस में घनिष्ठता से जुड़ी होती हैं।
स्वस्थ रहने, तंदुरुस्त रहने और शरीर को लचीला बनाए रखने के लिए किए जाने वाले योगासन योग के केवल बाह्य अभ्यास हैं। बेशक यह योग की वैधानिक शुरुआत है, लेकिन यही अंत नहीं है। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने आंतरिक शरीर में गहरी पैठ बनाता है, उसका मन आसन में डूबने लगता है।
पहला बाह्य अभ्यास सूखा और सतही रह जाता है, जबकि दूसरा गहन अभ्यास योग करने वाले को पसीने से भिगो देता है, उसे आसन के गहरे प्रभाव को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त रूप से गीला कर देता है। आसनों की महत्ता को कम करके मत आंकिए।
यहां तक कि एक सामान्य आसन में भी कोई व्यक्ति जिज्ञासा के तीन स्तरों का अनुभव करता हैः बाह्य जिज्ञासा, जो शरीर में मजबूती लाती है; आंतरिक जिज्ञासा, जो ज्ञान की स्थिरता लाती है; और अंतरतम की जिज्ञासा, जो आत्मा को दयावान बनाती है। योग की शुरुआत करने वाले जब आसन कर रहे होते हैं, तो सामान्यतः वे इन पहलुओं से अनजान होते हैं, लेकिन वे रहती हैं।
पहला बाह्य अभ्यास सूखा और सतही रह जाता है, जबकि दूसरा गहन अभ्यास योग करने वाले को पसीने से भिगो देता है, उसे आसन के गहरे प्रभाव को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त रूप से गीला कर देता है। आसनों की महत्ता को कम करके मत आंकिए।
यहां तक कि एक सामान्य आसन में भी कोई व्यक्ति जिज्ञासा के तीन स्तरों का अनुभव करता हैः बाह्य जिज्ञासा, जो शरीर में मजबूती लाती है; आंतरिक जिज्ञासा, जो ज्ञान की स्थिरता लाती है; और अंतरतम की जिज्ञासा, जो आत्मा को दयावान बनाती है। योग की शुरुआत करने वाले जब आसन कर रहे होते हैं, तो सामान्यतः वे इन पहलुओं से अनजान होते हैं, लेकिन वे रहती हैं।
अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि थोड़े से योगासन के बाद ही वे स्वयं को सक्रिय और हल्का महसूस करते हैं। यानी योग की सामान्य शुरुआत करने वाला व्यक्ति भी ऐसी तंदुरुस्ती का अनुभव करता है। यह केवल योग का बाहरी या शारीरिक प्रभाव भर नहीं है, बल्कि यह योग का आंतरिक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है।
जब तक शरीर पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होता, आप मात्र शारीरिक चेतना में फंसे होते हैं। यह आपको मानसिक विकास और स्वास्थ्य से रोकता है। हमें मजबूत शरीर चाहिए, तो हम दृढ़ मस्तिष्क का विकास कर सकते हैं। जब तक हम शरीर को उसकी सीमाओं से आगे नहीं ले जाएंगे और उसकी विवशताओं को दूर नहीं करेंगे, शरीर बाधक साबित होगा।
इसलिए हमें यह सीखना होगा कि हम अपनी ज्ञात सीमाओं से परे की खोज कैसे करें, जो हमारी जागरूकता को विस्तृत करे और हम स्वयं पर नियंत्रण किस तरह से करें। आसन इसके लिए सबसे आदर्श उपाय है।
योगगुरु बी के एस आयंगर को याद करते हुए उनकी किताब लाइन ऑन लाइफ: द योगा जर्नी टू होलनेस, इनर पीस, ऐंड अल्टीमेट फ्रीडम से एक अंश।
जब तक शरीर पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होता, आप मात्र शारीरिक चेतना में फंसे होते हैं। यह आपको मानसिक विकास और स्वास्थ्य से रोकता है। हमें मजबूत शरीर चाहिए, तो हम दृढ़ मस्तिष्क का विकास कर सकते हैं। जब तक हम शरीर को उसकी सीमाओं से आगे नहीं ले जाएंगे और उसकी विवशताओं को दूर नहीं करेंगे, शरीर बाधक साबित होगा।
इसलिए हमें यह सीखना होगा कि हम अपनी ज्ञात सीमाओं से परे की खोज कैसे करें, जो हमारी जागरूकता को विस्तृत करे और हम स्वयं पर नियंत्रण किस तरह से करें। आसन इसके लिए सबसे आदर्श उपाय है।
योगगुरु बी के एस आयंगर को याद करते हुए उनकी किताब लाइन ऑन लाइफ: द योगा जर्नी टू होलनेस, इनर पीस, ऐंड अल्टीमेट फ्रीडम से एक अंश।
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बुधवार, 20 अगस्त 2014
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
सीमा पर 45 साल से देश की रक्षा कर रही है हरभजन सिंह की आत्मा
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अगस्त 19, 2014 in सीमा पर 45 साल से देश की रक्षा कर रही है हरभजन सिंह की आत्मा

सिक्किम। देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले सैनिकों के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन क्या आपने कभी ऎसा भी सुना है कि एक सैनिक मरने के बाद भी पिछले 45 सालों से देश की सीमा पर तैनात है और बकायदा अपने सैनिकों की रक्षा कर रहा है। जी हां, ये बात सच्च है। पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 45 सालों से देश की सीमा की रक्षा कर रही है। सैनिकों का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है और यदि भारतीय सैनिकों को चीन के सैनिकों का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिकों को भी पहले ही बता देते है, ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए। आप चाहे इस पर यकीं करे या ना करे पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते है इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके।
हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था। हरभजन सिंह 24वीं पंजाब रेजिमेंट के जवान थे, जो की 1966 में आर्मी में भारत हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिçक्कम में, एक दुर्घटना में मारे गए। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई। सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उनमें आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया।
हालांकि जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वो विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो की बाबा हरभजन सिंह मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फीट की ऊंचाई पर स्तिथ है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फीट ज्यादा ऊंचाई पर स्तिथ है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।
बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है। इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गांव भी भेजा जाता था। इसके लिए ट्रैन में सीट रिजर्व की जाती थी, तीन सैनिकों के साथ उनका सारा सामान उनके गांव भेजा जाता था और दो महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था, क्योकि उस वक्त सैनिकों को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी, लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था, जिसमें की बड़ी संख्या में जनता इकट्ठी होने लगी थी।
कुछ लोगों इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है। लिहाजा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते है। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है, जिसमें प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते हैं। कहते है की रोज सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटें पाई जाती हैं। - See more at: sabhar http://www.patrika.com/
सिक्किम। देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले सैनिकों के बारे में तो आपने सुना ही होगा, लेकिन क्या आपने कभी ऎसा भी सुना है कि एक सैनिक मरने के बाद भी पिछले 45 सालों से देश की सीमा पर तैनात है और बकायदा अपने सैनिकों की रक्षा कर रहा है। जी हां, ये बात सच्च है। पंजाब रेजिमेंट के जवान हरभजन सिंह की आत्मा पिछले 45 सालों से देश की सीमा की रक्षा कर रही है। सैनिकों का कहना है की हरभजन सिंह की आत्मा, चीन की तरफ से होने वाले खतरे के बारे में पहले से ही उन्हें बता देती है और यदि भारतीय सैनिकों को चीन के सैनिकों का कोई भी मूवमेंट पसंद नहीं आता है तो उसके बारे में वो चीन के सैनिकों को भी पहले ही बता देते है, ताकि बात ज्यादा नहीं बिगड़े और मिल जुल कर बातचीत से उसका हल निकाल लिया जाए। आप चाहे इस पर यकीं करे या ना करे पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते है इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके।
हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था। हरभजन सिंह 24वीं पंजाब रेजिमेंट के जवान थे, जो की 1966 में आर्मी में भारत हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिçक्कम में, एक दुर्घटना में मारे गए। दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई। सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिकों की उनमें आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया।
हालांकि जब बाद में उनके चमत्कार बढ़ने लगे और वो विशाल जन समूह की आस्था का केंद्र हो गए तो उनके लिए एक नए मंदिर का निर्माण किया गया जो की बाबा हरभजन सिंह मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फीट की ऊंचाई पर स्तिथ है। पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फीट ज्यादा ऊंचाई पर स्तिथ है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।
बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है। इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रेंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक 2 महीने की छुट्टी पर गांव भी भेजा जाता था। इसके लिए ट्रैन में सीट रिजर्व की जाती थी, तीन सैनिकों के साथ उनका सारा सामान उनके गांव भेजा जाता था और दो महीने पूरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था, क्योकि उस वक्त सैनिकों को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी, लेकिन बाबा का सिक्किम से जाना और वापस आना एक धार्मिक आयोजन का रूप लेता जा रहा था, जिसमें की बड़ी संख्या में जनता इकट्ठी होने लगी थी।
कुछ लोगों इस आयोजन को अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाला मानते थे इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया क्योंकि सेना में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास की मनाही होती है। लिहाजा सेना ने बाबा को छुट्टी पर भेजना बंद कर दिया। अब बाबा साल के बारह महीने ड्यूटी पर रहते है। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है, जिसमें प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जूते रखे जाते हैं। कहते है की रोज सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटें पाई जाती हैं। - See more at: sabhar http://www.patrika.com/
लाइफस्टाइल बदलने से बढ़ती है उम्र
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अगस्त 19, 2014 in लाइफस्टाइल बदलने से बढ़ती है उम्र
जीवनशैली में परिवर्तन करके वृद्धावस्था की घड़ी को पीछे किया सकता है। एक नए अध्ययन से इस बात के समुचित सबूत मिले हैं कि जीवनशैली में फेरबदल करके हमारे डीएनए को सुरक्षा देने वाले टेलोमियर्स को लंबा किया जा सकता है। टेलोमियर्स कोशिका के नाभिक में पाए जाने वाले डीएनए के गुच्छे क्रोमोसोम (गुणसूत्र) के सिरों की टोपियां हैं। इधर कुछ समय से दुनिया में टेलोमियर पर गहन अनुसंधान चल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उम्र के साथ टेलोमियर की लंबाई घटती जाती है। किसी भी उम्र में छोटे टेलोमियर का होना खतरे की घंटी है। लेकिन उम्र के साथ टेलोमियर की लंबाई का घटना हर मामले में अलग-अलग होता है।
टेलोमियर डीएनए को जीर्ण-शीर्ण होने से बचाता है। इसकी तुलना शूलेस के सिरों पर लगे कवर से की जा सकती है। जिस तरह इस सिरे के अलग होने पर शूलेस बिखरने लगता है, ठीक उसी तरह टेलोमियर के कमजोर पड़ने पर हमारी कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है। हमारी कोशिकाएं हर समय विभाजित होती रहती हैं। हर विभाजन के बाद टेलोमियर की लंबाई कम होती जाती है और डीएनए का कुछ हिस्सा कम हो जाता है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि श्वेत रक्त कोशिकाओं में छोटे टेलोमियर का संबंध वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से है जिनमें कई तरह के कैंसर शामिल हैं। इसके अलावा जीवनशैली से जुड़ी आदतें भी टेलोमियर की लंबाई को प्रभावित करती हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रिवेंटिव मेडिसिन रिसर्च इंस्टिटयूट के रिसर्चरों का कहना है कि खानपान और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन करके टेलोमियर को लंबा होने के लिए उकसाया जा सकता है। रिसर्चरों ने अपने अध्ययन के लिए 35 लोगों को चुना जो कम रिस्क वाले प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। इनमें 25 लोगों को अपनी जीवनशैली और खानपान सुधारने को कहा गया। इन लोगों ने अशोधित अनाज, फल व सब्जियों पर आधारित शाकाहारी भोजन लेना शुरू किया और हर रोज तीस मिनट की साधारण कसरत को अपने शेड्यूल में शामिल किया। थकान व तनाव से मुक्ति के लिए इन लोगों को ध्यान और योगाभ्यास करने को कहा गया। सोशल सपोर्ट के लिए उनकी काउंसलिंग भी की गई। दस लोगों के दूसरे ग्रुप को सामान्य ढंग से जीने को कहा गया। पांच साल बाद दोनों ग्रुपों के रक्त के नमूनों के विश्लेषण से पता चला कि बदली जीवनशैली वाले लोगों की कोशिकाएं ज्यादा युवा थीं। उनके टेलोमियर की लंबाई में दस प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि पुराने अंदाज में जीने वाले लोगों में टेलोमियर की लंबाई तीन प्रतिशत कम हो गई।
इस अध्ययन से जुड़े प्रमुख रिसर्चर डीन ओर्निश का कहना है कि हमारे जीन और टेलोमियर हमारे शरीर की प्रकृति को दर्शाते है लेकिन यह जरुरी नहीं है कि वे हमारी नियति भी तय करें। हमारे शरीर के अंदर खुद को ठीकठाक करने की अद्भुत क्षमता है और यदि हम अपने स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारणों को दूर करने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन करें तो शरीर को चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को चिरयौवन की कोई जादुई गोली तो नहीं मिली है लेकिन यह खोज सही दिशा में बढ़ रही है। अभी तक हम यही सोचते थे कि टेलोमियर की लंबाई उम्र के साथ घटती जाती है। अब हमें पता चला है कि इसकी लंबाई बढ़ाई भी जा सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ओर्निश की टीम के अध्ययन से हमें जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए क्योंकि अध्ययन में शामिल दोनों ग्रुपों की निगरानी सिर्फ पांच साल ही की गई थी। एजिंग पर रिसर्च करने वाले कुछ अन्य विशेषज्ञों ने टेलोमियर की लंबाई से निकाले जा रहे निष्कर्षों से ही असहमति जताई है। न्यू यॉर्क सिटी में एल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रफेसर डॉ. नीर बर्जलाई का कहना है कि इस बात से सभी सहमत हैं कि टेलोमियर की लंबाई कुछ कह रही है लेकिन इसका अर्थ अभी तक स्पष्ट नहीं है। ओर्निश की रिसर्च से भी इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं मिलता। हो सकता है लंबे टेलोमियर की वजह से आप स्वस्थ हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि आपके स्वस्थ होने की वजह से आपके टेलोमियर लंबे है। बर्जलाई के अनुसार शतायु लोगों में 85 साल के लोगों की तुलना में लंबे टेलोमियर देखे गए हैं लेकिन उनका मानना है कि लंबे टेलोमियर उनके अच्छे स्वास्थ्य की वजह से हैं।
अमेरिका के नेशनल इंस्टिटयूट ऑन एजिंग के डॉ. नान-पिंग वेंग का कहना है कि यह सही है कि टेलोमियर छोटा होने से शरीर की प्रतिरोधी कोशिकाओं पर असर पड़ता है लेकिन बुढ़ापे की प्रक्रिया सिर्फ टेलोमियर पर नहीं, कई और चीजों पर भी निर्भर करती है। लंबे या छोटे टेलोमियर की भूमिका को लेकर वैज्ञानिकों के बीच असहमति तो है ही, साथ में इससे जुड़ी एक चीज उन्हें विचलित भी कर रही है। वह यह कि कैंसर कोशिकाओं में भी लंबे टेलोमियर देखे गए हैं। कुछ रिसर्चरों को डर है कि टेलोमियर की लंबाई बढ़ाने वाली दवाएं कैंसर को बढ़ावा दे सकती हैं। इसके बावजूद कुछ अमेरिकी कंपनियां ऐसी दवाओं के विकास में जुटी हुई हैं।
photo : googal
मुकुल व्यास
जीवनशैली में परिवर्तन करके वृद्धावस्था की घड़ी को पीछे किया सकता है। एक नए अध्ययन से इस बात के समुचित सबूत मिले हैं कि जीवनशैली में फेरबदल करके हमारे डीएनए को सुरक्षा देने वाले टेलोमियर्स को लंबा किया जा सकता है। टेलोमियर्स कोशिका के नाभिक में पाए जाने वाले डीएनए के गुच्छे क्रोमोसोम (गुणसूत्र) के सिरों की टोपियां हैं। इधर कुछ समय से दुनिया में टेलोमियर पर गहन अनुसंधान चल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उम्र के साथ टेलोमियर की लंबाई घटती जाती है। किसी भी उम्र में छोटे टेलोमियर का होना खतरे की घंटी है। लेकिन उम्र के साथ टेलोमियर की लंबाई का घटना हर मामले में अलग-अलग होता है।
टेलोमियर डीएनए को जीर्ण-शीर्ण होने से बचाता है। इसकी तुलना शूलेस के सिरों पर लगे कवर से की जा सकती है। जिस तरह इस सिरे के अलग होने पर शूलेस बिखरने लगता है, ठीक उसी तरह टेलोमियर के कमजोर पड़ने पर हमारी कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने का खतरा बढ़ जाता है। हमारी कोशिकाएं हर समय विभाजित होती रहती हैं। हर विभाजन के बाद टेलोमियर की लंबाई कम होती जाती है और डीएनए का कुछ हिस्सा कम हो जाता है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि श्वेत रक्त कोशिकाओं में छोटे टेलोमियर का संबंध वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों से है जिनमें कई तरह के कैंसर शामिल हैं। इसके अलावा जीवनशैली से जुड़ी आदतें भी टेलोमियर की लंबाई को प्रभावित करती हैं।
इस अध्ययन से जुड़े प्रमुख रिसर्चर डीन ओर्निश का कहना है कि हमारे जीन और टेलोमियर हमारे शरीर की प्रकृति को दर्शाते है लेकिन यह जरुरी नहीं है कि वे हमारी नियति भी तय करें। हमारे शरीर के अंदर खुद को ठीकठाक करने की अद्भुत क्षमता है और यदि हम अपने स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारणों को दूर करने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन करें तो शरीर को चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को चिरयौवन की कोई जादुई गोली तो नहीं मिली है लेकिन यह खोज सही दिशा में बढ़ रही है। अभी तक हम यही सोचते थे कि टेलोमियर की लंबाई उम्र के साथ घटती जाती है। अब हमें पता चला है कि इसकी लंबाई बढ़ाई भी जा सकती है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ओर्निश की टीम के अध्ययन से हमें जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए क्योंकि अध्ययन में शामिल दोनों ग्रुपों की निगरानी सिर्फ पांच साल ही की गई थी। एजिंग पर रिसर्च करने वाले कुछ अन्य विशेषज्ञों ने टेलोमियर की लंबाई से निकाले जा रहे निष्कर्षों से ही असहमति जताई है। न्यू यॉर्क सिटी में एल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ मेडिसिन के प्रफेसर डॉ. नीर बर्जलाई का कहना है कि इस बात से सभी सहमत हैं कि टेलोमियर की लंबाई कुछ कह रही है लेकिन इसका अर्थ अभी तक स्पष्ट नहीं है। ओर्निश की रिसर्च से भी इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं मिलता। हो सकता है लंबे टेलोमियर की वजह से आप स्वस्थ हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि आपके स्वस्थ होने की वजह से आपके टेलोमियर लंबे है। बर्जलाई के अनुसार शतायु लोगों में 85 साल के लोगों की तुलना में लंबे टेलोमियर देखे गए हैं लेकिन उनका मानना है कि लंबे टेलोमियर उनके अच्छे स्वास्थ्य की वजह से हैं।
अमेरिका के नेशनल इंस्टिटयूट ऑन एजिंग के डॉ. नान-पिंग वेंग का कहना है कि यह सही है कि टेलोमियर छोटा होने से शरीर की प्रतिरोधी कोशिकाओं पर असर पड़ता है लेकिन बुढ़ापे की प्रक्रिया सिर्फ टेलोमियर पर नहीं, कई और चीजों पर भी निर्भर करती है। लंबे या छोटे टेलोमियर की भूमिका को लेकर वैज्ञानिकों के बीच असहमति तो है ही, साथ में इससे जुड़ी एक चीज उन्हें विचलित भी कर रही है। वह यह कि कैंसर कोशिकाओं में भी लंबे टेलोमियर देखे गए हैं। कुछ रिसर्चरों को डर है कि टेलोमियर की लंबाई बढ़ाने वाली दवाएं कैंसर को बढ़ावा दे सकती हैं। इसके बावजूद कुछ अमेरिकी कंपनियां ऐसी दवाओं के विकास में जुटी हुई हैं।
sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/
हरियाणा के 'रोबो' की गूगल मेले में धूम
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अगस्त 19, 2014 in हरियाणा के 'रोबो' की गूगल मेले में धूम

पानीपत में बारहवीं के छात्र और रोबोटिक्स के शौकीन अर्श का दावा है कि वे मशीनें काफ़ी बड़ी और महंगी होती हैं. लोगों को सस्ता विकल्प उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने ये लोग संवाद के लिए अपनी सांसों के इशारे को समझने वाली डिवाइसों पर निर्भर करते हैं.
बोल न पाने वाले लकवाग्रस्त मरीज़ों के लिए सस्ता कम्युनिकेशन सिस्टम बनाने वाले हरियाणा के 16 वर्षीय छात्र क्लिक करेंअर्श शाह उर्फ 'रोबो'को चर्चित गूगल साइंस फ़ेयर में फाइनलिस्ट चुना गया है.
दुनिया की क़रीब डेढ़ प्रतिशत आबादी पार्किन्सन, एएलएस जैसी बीमारियों से ग्रस्त है जिनमें वे आम लोगों जैसी बातचीत नहीं कर पाते हैं.
पानीपत में बारहवीं के छात्र और रोबोटिक्स के शौकीन अर्श का दावा है कि वे मशीनें काफ़ी बड़ी और महंगी होती हैं. लोगों को सस्ता विकल्प उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने ये लोग संवाद के लिए अपनी सांसों के इशारे को समझने वाली डिवाइसों पर निर्भर करते हैं.
क्लिक करेंपॉकेट डिवाइस ‘टॉक’बनाया है.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, “टॉक पॉकेट में फिट हो जाती है और इसकी क़ीमत पांच से सात हज़ार के बीच है. आमतौर पर ऐसी दूसरी डिवाइसों के लिए लाखों चुकाने पड़ते हैं.”
कैसे काम करता है टॉक?
अर्श के अनुसार, ‘टॉक’ एक ब्रेथ सेंसर के साथ जुड़ा होता है, जो मरीज़ के कान पर फिट होता है और उसका सेंसर ठीक नाक के नीचे पहुंचता है.
मरीज़ ‘मोर्स कोड’ के आधार पर अपने सांसों की तीव्रता और पैटर्न के ज़रिए इनपुट दर्ज़ करते हैं.
टॉक इन इशारों को ऑडियो संदेशों में बदल देता है. जिन वाक्यों का प्रयोग अक्सर किया जाता हो उनके लिए शॉर्टकोड भी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस डिवाइस से उन मरीज़ों को फ़ायदा होगा, जो किसी बीमारी की वजह से बोल या हिल-डुल नहीं सकते हों.
बाज़ार में कब आएगा टॉक?
इस डिवाइस को लोगों तक पहुंचाने के लिए अर्श ने ‘क्राउड फंडिंग’ का रास्ता चुना है और उनके अनुसार मार्च 2015 तक टॉक बाज़ार में आ जाएगा.
साइंस फेयर के लिए गूगल ने दुनियाभर से 15 फाइनलिस्टों को चुना है जिनमें एशिया से अकेले अर्श चुने गए हैं.
क्लिक करेंगूगल साइंस फ़ेयर 2014 के विजेता की घोषणा सितंबर में की जाएगी.
विजेता को पचास हज़ार डॉलर की स्कॉलरशिप और गैलापगोस, वर्जिन गैलेक्टिक स्पेसपोर्ट में घूमने का मौका मिलेगा. sabhar :http://www.bbc.co.uk/
बुधवार, 6 अगस्त 2014
स्मार्टफोन से नहीं होता कुछ भी डिलीट
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अगस्त 06, 2014 in स्मार्टफोन से नहीं होता कुछ भी डिलीट
किसी को भेजा गया कोई ईमेल संदेश, एसएमएस या फिर अंतरंग तस्वीर आपके लिए चिंता का विषय बन सकता है. फोन से इसे हमेशा के लिए डिलीट करने के बाद भी, दरअसल यह फोन में ही छिपा रहता है और आपके दुश्मनों के हाथ लग सकता है.
अपने कंप्यूटर पर जब आप किसी चीज को डिलीट कर देते हैं, तो वह रिसाइकिल बिन में जा कर सेव हो जाती है. इसी तरह ईमेल के इनबॉक्स से जब कुछ डिलीट किया जाता है, तो वह भी ट्रैश में सेव हो जाता है. अगर कंप्यूटर या मेल बॉक्स से हमेशा के लिए चीजें हटाना चाहें तो रिसाइकिल बिन और ट्रैश से भी उन्हें हटाना पड़ता है. इसके बाद आप चैन की सांस लेते हैं. पर सच्चाई यह है कि भले ही वह फाइल, फोल्डर या तस्वीर आपको नजर नहीं आ रही हो, लेकिन अब भी कहीं ना कहीं आपके कंप्यूटर में ही पड़ी है. कंप्यूटर एक्सपर्ट सॉफ्टवेयर की मदद से डिलीट की हुई चीजों को दोबारा निकाल सकते हैं. स्मार्टफोन भी बिलकुल इसी तरह काम करते हैं. इसलिए उनमें जमा आपकी सारी निजी जानकारी कभी भी वहां से नहीं हटती.
सेल्फी से सावधान
इसी बात की पुष्टि करने के लिए एंटी वायरस सॉफ्टवेयर की जानीमानी कंपनी अवास्ट ने ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट ईबे से बीस सेकंड हैंड एंड्रॉयड फोन खरीदे. बाजार में उपलब्ध सॉफ्टवेयर की मदद से चेक गणराज्य की इस कंपनी ने सभी फोनों में से डिलीट की हुई चीजें ढूंढ निकाली. अवास्ट के सीईओ क्रिस बेनहम कहते हैं, "हमारे फोन अब कंप्यूटर की जगह लेते जा रहे हैं. लोग फोन पर ही ऑनलाइन बैंकिंग के ऐप डाउनलोड कर लेते हैं और हर वह काम, जो वे पहले कंप्यूटर पर किया करते थे, अब फोन पर कर रहे हैं."
अवास्ट की मोबाइल शाखा के अध्यक्ष जूड मैककॉलगन ने डॉयचे वेले को बताया कि उन्हें इन बीस फोनों से 40,000 तस्वीरें मिलीं. इनमें करीब एक हजार अश्लील तस्वीरें भी शामिल हैं. मैककॉलगन बताते हैं कि लोग अंतरंग पलों में अपनी तस्वीरें लेते हैं और बाद में उन्हें फोन से मिटा कर संतुष्ट हो जाते हैं, "लेकिन अगर आप किसी को अपना फोन बेच देते हैं, तो वह किसी एक्सपर्ट के पास जा कर आपकी सारी जानकारी निकलवा सकता है."
एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर की गड़बड़?
फोन बेचने से पहले लोग अक्सर 'फैक्ट्री रिस्टोर सेटिंग' पर जाते हैं जिसे एक्टिवेट करने से फोन से सब कुछ अपने आप डिलीट हो जाता है और फोन दोबारा वैसा ही हो जाता है, जैसा खरीदते समय था. अवास्ट ने जो फोन खरीदे, वे सब फैक्ट्री रिस्टोर पर थे. गूगल को जब इस बारे में पता चला तो आनन फानन में बयान दे दिया कि इन सभी फोनों में एंड्रॉयड के पुराने सॉफ्टवेयर हैं और पिछले तीन साल में गूगल इस समस्या को हल कर चुका है. लेकिन अवास्ट की मानें तो अधिकतर फोन एंड्रॉयड के ताजा सॉफ्टवेयर पर चल रहे थे.
हालांकि कुछ लोग इसे अवास्ट का पब्लिसिटी स्टंट भी मान रहे हैं, ताकि लोग अपने फोन को सुरक्षित रखने के लिए अवास्ट के सॉफ्टवेयर खरीदने लगें. सच्चाई कुछ भी हो पर जरूरी है कि इंटरनेट के इस दौर में अपनी सुरक्षा खुद की जाए और किसी नुकसान से बचने के लिए अपने फोन को सोच समझ कर इस्तेमाल किया जाए.
रिपोर्ट: रॉब कैमरन/ईशा भाटिया
संपादन: आभा मोंढे
sabhar : dw.de
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शनिवार, 2 अगस्त 2014
अब बनेगा हवा से पीने का पानी, आ गई मशीन
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अगस्त 02, 2014 in अब बनेगा हवा से पीने का पानी, आ गई मशीन

इजराइल। जल जीवन का दूसरा नाम है। जिसके बिना प्राणी जगत की कल्पना भी अधूरी है। पीने का जल जो एक पोषक तत्व की भूमिका भी निभाता है, मानव शरीर का 60 से 70 प्रतिशत भाग बनाता है।
कहते हैं तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा, लेकिन अब घबराने की आवश्यकता नहीं है। एक अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट में छपी खबर के अनुसार हवा से पानी बनाने वाली मशीन बन चुकी है।
विश्व में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां लोगों को पीने के लिए शुद्ध जल प्राप्त नहीं हो पाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में तकरीबन 78 करोड़ लोगों को पीने का शुद्ध जल उपलब्ध नहीं हो पाता है और हर साल तकरीबन 34 लाख लोग केवल जल की दूषित होने से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।वाटरजेन' नामक कंपनी ने हाल ही में हवा से जल बनाने की तकनीक को विकसित किया है। जिसमें अधिक नमी वाली हवा के तापमान को कम किया जाता है और इसके फलस्वरूप हवा में मौजूद जल के अणु नीचे गिरने लगते हैं और इन्हें एकत्रित कर लिया जाता है।
कंपनी के सहायक सीईओ ए कोहावी के अनुसार ''हवा के इस तंत्र में से गुजारने के पर सिस्टम हवा में की आर्द्रता को कम करने का काम करता है और एकत्रित जल को एक विशेष टैंक में एकत्रित कर लिया जाता है।''
आगे उन्होंने बताया कि ''इस जल को एक बड़े फिल्टरेशन तंत्र से गुजारा जाता है, जिसके कारण इसमें होने वाली संभावित सूक्ष्मजैव या रसायन संबंधी अशुद्धियां अलग हो जाती हैं। इसके बाद जल को एक विशाल टैंक में रखा जाता है, जहां जल की शुद्धता के सारे पैमानों का ध्यान रखा जाता है।
''
हालांकि इस तरह के यंत्र अन्य कंपनियों द्वारा भी बनाए जा चुके हैं, जिनका उपयोग औद्योगिक और घरेलू कार्यों में किया जाता है। लेकिन 'वाटरजेन' का दावा है कि उनके द्वारा विकसित किए गए इस यंत्र में कम से कम ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा।
आगे कोहावी ने बताया कि ''हालांकि कुछ अन्य कंपनियां भी इसका दावा करती हैं और यह इतना मुश्किल कार्य नहीं है कि हवा से जल के अणु एकत्रित कर लिए जाएं। लेकिन मुद्दा यह है कि कम से कम ऊर्जा की खपत में इस कार्य को अंजाम दिया जाए।''
आगे उन्होंने बताया कि जब हम इस कार्य को और अधिक कुशलता से कर पाऐंगे तो वास्तव में पीने के जल की समस्या का इससे अच्छा निवारण कोई दूसरा नहीं हो सकता कि वायु से ही जल बना लिया जाए।
यह यंत्र एक दिन में 250-800 लीटर जल निर्मित कर सकता है जिसकी मात्रा तापमान और आर्द्रता के आधार पर भिन्न हो सकती है।
कंपनी ने प्रारंभ में इस तकनीक का उपयोग आईडीए या 'इजराइल डिफेंस फोर्स' के लिए किया। और वर्तमान में 'वाटरजेन' कंपनी सात देशों की रक्षा सेनाओं को लिए सेवा प्रदान कर रही है। लेकिन अब कंपनी इस आम लोगों के लिए भी बाजार में उपलब्ध कराना चाहती है।
कोहावी ने आगे बताया कि कंपनी इस प्रोडक्ट को कई देशों जैसे भारत के बाज़ार में उतारना चाहता है, जहां पीने के शुद्ध जल की समस्या है। इससे वहां के लोगों को शुद्ध जल के लिए वाटर सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। आगे कोहावी बताते हैं कि ''यह सिस्टम मात्र 1.5 रुपए में एक लीटर शुद्ध जल निर्मित करेगा जबकि वाटर बॉटल खरीदने पर आप एक लीटर शुद्ध जल के लिए 15 रुपए चुकाते हैं। (एजेंसियां)
इजराइल। जल जीवन का दूसरा नाम है। जिसके बिना प्राणी जगत की कल्पना भी अधूरी है। पीने का जल जो एक पोषक तत्व की भूमिका भी निभाता है, मानव शरीर का 60 से 70 प्रतिशत भाग बनाता है।
कहते हैं तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा, लेकिन अब घबराने की आवश्यकता नहीं है। एक अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट में छपी खबर के अनुसार हवा से पानी बनाने वाली मशीन बन चुकी है।
विश्व में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां लोगों को पीने के लिए शुद्ध जल प्राप्त नहीं हो पाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में तकरीबन 78 करोड़ लोगों को पीने का शुद्ध जल उपलब्ध नहीं हो पाता है और हर साल तकरीबन 34 लाख लोग केवल जल की दूषित होने से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं।वाटरजेन' नामक कंपनी ने हाल ही में हवा से जल बनाने की तकनीक को विकसित किया है। जिसमें अधिक नमी वाली हवा के तापमान को कम किया जाता है और इसके फलस्वरूप हवा में मौजूद जल के अणु नीचे गिरने लगते हैं और इन्हें एकत्रित कर लिया जाता है।
कंपनी के सहायक सीईओ ए कोहावी के अनुसार ''हवा के इस तंत्र में से गुजारने के पर सिस्टम हवा में की आर्द्रता को कम करने का काम करता है और एकत्रित जल को एक विशेष टैंक में एकत्रित कर लिया जाता है।''
आगे उन्होंने बताया कि ''इस जल को एक बड़े फिल्टरेशन तंत्र से गुजारा जाता है, जिसके कारण इसमें होने वाली संभावित सूक्ष्मजैव या रसायन संबंधी अशुद्धियां अलग हो जाती हैं। इसके बाद जल को एक विशाल टैंक में रखा जाता है, जहां जल की शुद्धता के सारे पैमानों का ध्यान रखा जाता है।
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हालांकि इस तरह के यंत्र अन्य कंपनियों द्वारा भी बनाए जा चुके हैं, जिनका उपयोग औद्योगिक और घरेलू कार्यों में किया जाता है। लेकिन 'वाटरजेन' का दावा है कि उनके द्वारा विकसित किए गए इस यंत्र में कम से कम ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा।
आगे कोहावी ने बताया कि ''हालांकि कुछ अन्य कंपनियां भी इसका दावा करती हैं और यह इतना मुश्किल कार्य नहीं है कि हवा से जल के अणु एकत्रित कर लिए जाएं। लेकिन मुद्दा यह है कि कम से कम ऊर्जा की खपत में इस कार्य को अंजाम दिया जाए।''
आगे उन्होंने बताया कि जब हम इस कार्य को और अधिक कुशलता से कर पाऐंगे तो वास्तव में पीने के जल की समस्या का इससे अच्छा निवारण कोई दूसरा नहीं हो सकता कि वायु से ही जल बना लिया जाए।
यह यंत्र एक दिन में 250-800 लीटर जल निर्मित कर सकता है जिसकी मात्रा तापमान और आर्द्रता के आधार पर भिन्न हो सकती है।
कंपनी ने प्रारंभ में इस तकनीक का उपयोग आईडीए या 'इजराइल डिफेंस फोर्स' के लिए किया। और वर्तमान में 'वाटरजेन' कंपनी सात देशों की रक्षा सेनाओं को लिए सेवा प्रदान कर रही है। लेकिन अब कंपनी इस आम लोगों के लिए भी बाजार में उपलब्ध कराना चाहती है।
कोहावी ने आगे बताया कि कंपनी इस प्रोडक्ट को कई देशों जैसे भारत के बाज़ार में उतारना चाहता है, जहां पीने के शुद्ध जल की समस्या है। इससे वहां के लोगों को शुद्ध जल के लिए वाटर सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। आगे कोहावी बताते हैं कि ''यह सिस्टम मात्र 1.5 रुपए में एक लीटर शुद्ध जल निर्मित करेगा जबकि वाटर बॉटल खरीदने पर आप एक लीटर शुद्ध जल के लिए 15 रुपए चुकाते हैं। (एजेंसियां)
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