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सोमवार, 24 जुलाई 2023

क्यों होती हैं स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाएं

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कुरान के सार्वजनिक अपमान की घटनाओं के बाद देश के भीतर ही नहीं, मुस्लिम मुल्कों में भी यह सवाल उठा है कि आखिर स्वीडन में इस तरह की घटनाएं क्यों होती हैं.

इस तरह का एक और मामला बीते गुरूवार का है जब इराकी दूतावास के सामने दो पुरुषों ने कुरान को ठोकर मारी और पैरों से कुचला. इस प्रदर्शन को पुलिस की इजाजत मिली हुई थी जबकि इसके विरोध में उतरे लोगों को दूरी पर रखा गया. इसी व्यक्ति ने स्टॉकहोम मस्जिद के बाहर पिछले महीने कुरान जलाई थी और उसे भी पुलिस की मंजूरी हासिल थी. 2023 की शुरूआत में इसी तरह की हरकत डेनमार्क में एक धुर दक्षिणपंथी कार्यकर्ता ने तुर्की दूतावास के सामने की थी. स्वीडन इस तरह की घटनाओं से कैसे निपट रहा है?

क्या स्वीडन में कुरान जलाने की इजाजत है?

देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्मग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता हो. ज्यादातर पश्चिमी देशों की तरह स्वीडन में ईशनिंदा से जुड़ा कोई कायदा-कानून नहीं है. ऐसा हमेशा से नहीं था. 19वीं सदी में ईशनिंदा को भयानक अपराध माना जाता था जिसमें मृत्युदंड की सजा थी लेकिन जैसे जैसे देश धर्मनिरपेक्षता की तरफ बढ़ा, ईशनिंदा कानून में ढील दी गई. इस तरह का आखिरी कानून 1970 में खत्म कर दिया गया.


कानून का राज्ययूरोप

क्यों होती हैं स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाएं

12 घंटे पहले

कुरान के सार्वजनिक अपमान की घटनाओं के बाद देश के भीतर ही नहीं, मुस्लिम मुल्कों में भी यह सवाल उठा है कि आखिर स्वीडन में इस तरह की घटनाएं क्यों होती हैं.

https://p.dw.com/p/4UK3F
स्वीडन में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्म ग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता हो
स्वीडन में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्म ग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता होतस्वीर: Christine Olsson/TT/IMAGO

इस तरह का एक और मामला बीते गुरूवार का है जब इराकी दूतावास के सामने दो पुरुषों ने कुरान को ठोकर मारी और पैरों से कुचला. इस प्रदर्शन को पुलिस की इजाजत मिली हुई थी जबकि इसके विरोध में उतरे लोगों को दूरी पर रखा गया. इसी व्यक्ति ने स्टॉकहोम मस्जिद के बाहर पिछले महीने कुरान जलाई थी और उसे भी पुलिस की मंजूरी हासिल थी. 2023 की शुरूआत में इसी तरह की हरकत डेनमार्क में एक धुर दक्षिणपंथी कार्यकर्ता ने तुर्की दूतावास के सामने की थी. स्वीडन इस तरह की घटनाओं से कैसे निपट रहा है?

क्या स्वीडन में कुरान जलाने की इजाजत है?

देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्मग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता हो. ज्यादातर पश्चिमी देशों की तरह स्वीडन में ईशनिंदा से जुड़ा कोई कायदा-कानून नहीं है. ऐसा हमेशा से नहीं था. 19वीं सदी में ईशनिंदा को भयानक अपराध माना जाता था जिसमें मृत्युदंड की सजा थी लेकिन जैसे जैसे देश धर्मनिरपेक्षता की तरफ बढ़ा, ईशनिंदा कानून में ढील दी गई. इस तरह का आखिरी कानून 1970 में खत्म कर दिया गया.

मुस्लिम देशों ने स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाओं पर सवाल उठाया है
मुस्लिम देशों ने स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाओं पर सवाल उठाया हैतस्वीर: Bilal Hussein/AP/picture alliance

नाटो: कुरान जलाने के बाद बढ़ी स्वीडन की मुश्किलें

बहुत से मुस्लिम देशों ने स्वीडन की सरकार से इस दिशा में कार्रवाई की मांग की है. हालांकि यह तय करना पुलिस का काम है कि किसी जन प्रदर्शन को इजाजत दी जाएगी या नहीं. सरकार यह फैसला नहीं करती. बोलने की आजादी संवैधानिक अधिकार है और पुलिस ऐसे किसी विरोध-प्रदर्शन को तभी रोक सकती है जब वह जन सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करे. फरवरी महीने में पुलिस ने यही किया जब कुरान जलाने से संबंधित दो अर्जियों को खारिज किया गया. इसके पीछे सुरक्षा एजेंसी के आकलन को आधार बनाया गया कि इस तरह की चीजें देश में आंतकी हमलों का कारण बन सकती हैं. हालांकि कोर्ट ने पुलिस के फैसले को यह कहते हुए उलट दिया कि लोगों के सार्वजनिक प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिस को खतरे के ज्यादा ठोस सुबूत देने होंगे.

क्या कुरान जलाने को नफरती बयान माना जाए?

स्वीडन में हेट-स्पीच कानून धर्म, नस्ल, सेक्सुअल और लैंगिक पहचान के आधार पर भड़काऊ बयानों को रोकता है. कुछ लोगों का मानना है कि कुरान जलाना मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ गतिविधि है इसलिए इसे रोका जाना चाहिए. एक विचार यह भी है कि यह इस्लाम के खिलाफ है केवल मुसलमानों के नहीं इसलिए यह धर्म की आलोचना के अधिकार का मसला है जिसकी आजादी होनी ही चाहिए. भले ही फिर कोई इसके विरोध में क्यों ना हो.


कानून का राज्ययूरोप

क्यों होती हैं स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाएं

12 घंटे पहले

कुरान के सार्वजनिक अपमान की घटनाओं के बाद देश के भीतर ही नहीं, मुस्लिम मुल्कों में भी यह सवाल उठा है कि आखिर स्वीडन में इस तरह की घटनाएं क्यों होती हैं.

https://p.dw.com/p/4UK3F
स्वीडन में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्म ग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता हो
स्वीडन में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्म ग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता होतस्वीर: Christine Olsson/TT/IMAGO

इस तरह का एक और मामला बीते गुरूवार का है जब इराकी दूतावास के सामने दो पुरुषों ने कुरान को ठोकर मारी और पैरों से कुचला. इस प्रदर्शन को पुलिस की इजाजत मिली हुई थी जबकि इसके विरोध में उतरे लोगों को दूरी पर रखा गया. इसी व्यक्ति ने स्टॉकहोम मस्जिद के बाहर पिछले महीने कुरान जलाई थी और उसे भी पुलिस की मंजूरी हासिल थी. 2023 की शुरूआत में इसी तरह की हरकत डेनमार्क में एक धुर दक्षिणपंथी कार्यकर्ता ने तुर्की दूतावास के सामने की थी. स्वीडन इस तरह की घटनाओं से कैसे निपट रहा है?

क्या स्वीडन में कुरान जलाने की इजाजत है?

देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कुरान या किसी भी धर्मग्रंथ के अपमान या जलाने जैसी घटना को रोकता हो. ज्यादातर पश्चिमी देशों की तरह स्वीडन में ईशनिंदा से जुड़ा कोई कायदा-कानून नहीं है. ऐसा हमेशा से नहीं था. 19वीं सदी में ईशनिंदा को भयानक अपराध माना जाता था जिसमें मृत्युदंड की सजा थी लेकिन जैसे जैसे देश धर्मनिरपेक्षता की तरफ बढ़ा, ईशनिंदा कानून में ढील दी गई. इस तरह का आखिरी कानून 1970 में खत्म कर दिया गया.

मुस्लिम देशों ने स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाओं पर सवाल उठाया है
मुस्लिम देशों ने स्वीडन में कुरान जलाने की घटनाओं पर सवाल उठाया हैतस्वीर: Bilal Hussein/AP/picture alliance

नाटो: कुरान जलाने के बाद बढ़ी स्वीडन की मुश्किलें

बहुत से मुस्लिम देशों ने स्वीडन की सरकार से इस दिशा में कार्रवाई की मांग की है. हालांकि यह तय करना पुलिस का काम है कि किसी जन प्रदर्शन को इजाजत दी जाएगी या नहीं. सरकार यह फैसला नहीं करती. बोलने की आजादी संवैधानिक अधिकार है और पुलिस ऐसे किसी विरोध-प्रदर्शन को तभी रोक सकती है जब वह जन सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करे. फरवरी महीने में पुलिस ने यही किया जब कुरान जलाने से संबंधित दो अर्जियों को खारिज किया गया. इसके पीछे सुरक्षा एजेंसी के आकलन को आधार बनाया गया कि इस तरह की चीजें देश में आंतकी हमलों का कारण बन सकती हैं. हालांकि कोर्ट ने पुलिस के फैसले को यह कहते हुए उलट दिया कि लोगों के सार्वजनिक प्रदर्शनों को रोकने के लिए पुलिस को खतरे के ज्यादा ठोस सुबूत देने होंगे.

क्या कुरान जलाने को नफरती बयान माना जाए?

स्वीडन में हेट-स्पीच कानून धर्म, नस्ल, सेक्सुअल और लैंगिक पहचान के आधार पर भड़काऊ बयानों को रोकता है. कुछ लोगों का मानना है कि कुरान जलाना मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ गतिविधि है इसलिए इसे रोका जाना चाहिए. एक विचार यह भी है कि यह इस्लाम के खिलाफ है केवल मुसलमानों के नहीं इसलिए यह धर्म की आलोचना के अधिकार का मसला है जिसकी आजादी होनी ही चाहिए. भले ही फिर कोई इसके विरोध में क्यों ना हो.

पुलिस की निष्पक्षता जांचने के लिए एक व्यक्ति ने बाइबिल और तोराह जलाने की बात कही थी हालांकि बाद में उसने इरादा बदल दिया
पुलिस की निष्पक्षता जांचने के लिए एक व्यक्ति ने बाइबिल और तोराह जलाने की बात कही थी हालांकि बाद में उसने इरादा बदल दियातस्वीर: Magnus Lejhall/TT News Agency/AP Photo/picture alliance

स्वीडन: हमले की आशंका के बीच पुलिस ने कुरान जलाने वाली रैली बैन की

इन घटनाओं से दुखी कुछ मुसलमानों ने यह सवाल भी उठाया कि अगर किसी दूसरे धर्मकी पवित्र किताबों को जलाया गया होता तब भी क्या स्वीडन की पुलिस इसकी इजाजत देती?इसका टेस्ट करने के लिए एक मुसलमान आदमी ने पुलिस को एप्लीकेशन भेजा कि उसे इस्राएली दूतावास के बाहर प्रदर्शन करते हुए तोराह और बाइबिल जलाने की इजाजत दी जाए. इस्राएली अधिकारियों और यहूदी समुदाय ने इसकी आलोचना की लेकिन पुलिस ने इसकी इजाजत दे दी. हालांकि जब वह व्यक्ति नियत स्थान पर पहुंचा तो उसने यह कह कर इरादा बदल दिया कि वह मुसलमान है और सभी धर्मग्रंथ जलाने के विरोध में है.

दुनिया भर में कैसा है ईश निंदा कानून

ईश निंदा बहुत से देशों मैं कानूनी अपराध है. पियू रिसर्च सेंटर के 2019 के एक शोध मुताबिक 198 में से 79 देशों में ऐसे कानून या नीतियां हैं जो ईश्वर की निंदा को रोकते हैं. अफगानिस्तान, ब्रुनेई, ईरान, नाइजीरिया, पाकिस्तान और सउदी अरब जैसे देशों में इन मामलों में मौत की सजा भी दी जा सकती है

स्वीडन में क्यों भड़के हुए हैं मुसलमान?

मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के 20 में से 18 देशों में इस तरह की हरकत अपराध की श्रेणी में आती है हालांकि ज्यादातर मामलों में मौत की सजा नहीं दी जाती. इराक में किसी धार्मिक तबके में पवित्र माने जाने वाले चिन्हों का अपमान करने पर तीन साल जेल की सजा होती है. 1975 से 1990 के बीच गृहयुद्ध झेलने वाले लेबनान में भी सामुदायिक झगड़ा भड़काने वाली ऐसी किसी घटना पर तीन साल तक कैद हो सकती है. अमेरिका में पहले संवैधानिक संशोधन के बाद मिले अधिकारों के तहत कुरान जलाना कानूनी तौर पर अपराध नहीं है.

एसबी/एनआर (एपी) sabhar Dw.de


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जियो बुक लैपटॉप भारत में 31 जुलाई को लॉन्च होगा:डिवाइस में 4G कनेक्टिविटी के साथ ऑक्टा-कोर प्रोसेसर, एक्सपेक्टेड प्राइस ₹20,000

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जियो बुक लैपटॉप भारत में 31 जुलाई को लॉन्च होगा:डिवाइस में 4G कनेक्टिविटी के साथ ऑक्टा-कोर प्रोसेसर, एक्सपेक्टेड प्राइस ₹20,000 

रिलायंस जियो 31 जुलाई को भारत में अपना नया जियो बुक (JioBook) लैपटॉप लॉन्च करने जा रहा है। ई-कॉमर्स वेबसाइट अमेजन ने जियो बुक को टीज करते हुए लॉन्च डेट और के बारे में जानकारी दी है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक इसके बारे में ऑफिशियल तौर पर जानकारी नहीं दी है।

टीजर के अनुसार, जियो बुक को प्रोडक्टिविटी , एंटरटेनमेंट और गेमिंग के लिए डिजाइन किया गया है। लैपटॉप में 4G कनेक्टिविटी मिलेगी और परफॉर्मेंस के लिए ऑक्टा-कोर प्रोसेसर दिया जाएगा, जिसकी मदद से यूजर्स हाई-डेफिनिशन वीडियो स्ट्रीमिंग, मल्टीटास्किंग कर सकेंगे।

990 ग्राम वजन के साथ कॉम्पैक्ट साइज में आएगा JioBook
टीजर में बताया गया है कि जियो बुक लैपटॉप कॉम्पैक्ट साइज में आएगा, जिसका वजन 990 ग्राम होगा। वहीं, डिजाइन की बात करें तो कंपनी ने अक्टूबर 2022 में जो लैपटॉप लॉन्च किया था वैसी ही डिजाइन इसमें भी देखने को मिलती है।

जियो बुक लैपटॉप भारत में 31 जुलाई को लॉन्च होगा:डिवाइस में 4G कनेक्टिविटी के साथ ऑक्टा-कोर प्रोसेसर, एक्सपेक्टेड प्राइस ₹20,000

नई दिल्ली16 घंटे पहले

रिलायंस जियो 31 जुलाई को भारत में अपना नया जियो बुक (JioBook) लैपटॉप लॉन्च करने जा रहा है। ई-कॉमर्स वेबसाइट अमेजन ने जियो बुक को टीज करते हुए लॉन्च डेट और के बारे में जानकारी दी है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक इसके बारे में ऑफिशियल तौर पर जानकारी नहीं दी है।

टीजर के अनुसार, जियो बुक को प्रोडक्टिविटी , एंटरटेनमेंट और गेमिंग के लिए डिजाइन किया गया है। लैपटॉप में 4G कनेक्टिविटी मिलेगी और परफॉर्मेंस के लिए ऑक्टा-कोर प्रोसेसर दिया जाएगा, जिसकी मदद से यूजर्स हाई-डेफिनिशन वीडियो स्ट्रीमिंग, मल्टीटास्किंग कर सकेंगे।

990 ग्राम वजन के साथ कॉम्पैक्ट साइज में आएगा JioBook
टीजर में बताया गया है कि जियो बुक लैपटॉप कॉम्पैक्ट साइज में आएगा, जिसका वजन 990 ग्राम होगा। वहीं, डिजाइन की बात करें तो कंपनी ने अक्टूबर 2022 में जो लैपटॉप लॉन्च किया था वैसी ही डिजाइन इसमें भी देखने को मिलती है।

जियो बुक लैपटॉप का वजन 990 ग्राम होगा।
जियो बुक लैपटॉप का वजन 990 ग्राम होगा।

20,000 रुपए में लॉन्च हो सकता है JioBook
मीडिया रिपोर्ट की माने तो कंपनी अपकमिंग JioBook को 20,000 रुपए में लॉन्च कर सकती है। इससे पहले कंपनी ने फस्ट जनरेशन जियोबुक को 15,000 रुपए में लॉन्च किया था।

JioBook 2022: स्पेसिफिकेशन्स

  • डिस्प्ले : JioBook में 11.6 इंच की HD डिस्प्ले मिलता है। डिस्प्ले के चारो साइड में चौड़े बेज़ल्स मिलते हैं, जिसमें वीडियो कॉलिंग के लिए 2MP का कैमरा दिया गया है।
  • हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर : JioBook 2022 लैपटॉप 2GB रैम + 32GB इंटरनर्ल स्टोरेज के साथ आता है, जिसकी स्टोरेज को 128GB तक बढ़ाया जा सकता है। लैपटॉप में JioOS मिलता है, जिसमें थर्ड-पार्टी ऐप्स इंस्टॉल करने के लिए JioStore दिया गया है।
  • बैटरी : पावर बैकअप के लिए लैपटॉप में 5000mAh की बैटरी दी गई है। कंपनी ने दावा किया है कि बैटरी एक बार चार्ज होने के बाद 8 घंटे का बैकअप देगी।
  • कनेक्टिविटी ऑप्शन : कनेक्टिविटी के लिए लैपटॉप में 3.5 mm ऑडियो जैक, ब्लूटूथ 5.0, मिनी HDMI, Wi-Fi मिलता है।  sabhar Bhaska.com

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PF पर 8.15% मिलेगा ब्याज, सरकार की मंजूरी:2022-2023 के लिए 0.05% बढ़ाया, 1 लाख जमा पर 8150 इंटरेस्ट मिलेगा

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 सरकार ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए प्रोविडेंट फंड (PF) अकाउंट पर 8.15% ब्याज को मंजूरी दे दी है। एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (EPFO) ने मार्च में ब्याज दरें 0.05% बढ़ाने की सिफारिश की थी। यानी अगर आपके 1 लाख रुपए जमा है तो इस पर साल में 8,150 रुपए का ब्याज मिलेगा। EPFO ने 24 जुलाई (सोमवार) को इसका ऑर्डर जारी किया।

देश के 6 करोड़ से ज्यादा कर्मचारी PF के दायरे में आते हैं। EPFO एक्ट के तहत कर्मचारी की बेसिक सैलरी प्लस DA का 12% PF अकाउंट में जाता है। कंपनी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी प्लस DA का 12% कॉन्ट्रीब्यूट करती है। कंपनी के 12% कॉन्ट्रीब्यूशन में से 3.67% PF अकाउंट में जाता है और बाकी 8.33% पेंशन स्कीम में जाता है।

PF पर 8.15% मिलेगा ब्याज, सरकार की मंजूरी:2022-2023 के लिए 0.05% बढ़ाया, 1 लाख जमा पर 8150 इंटरेस्ट मिलेगा 3% ब्याज से शुरुआत हुई थी
1952 में PF पर ब्याज दर केवल 3% थी। हालांकि, इसके बाद इसमें बढ़ोतरी होती गई। पहली बार 1972 में यह 6% के ऊपर पहुंची। 1984 में यह पहली बार 10% के ऊपर पहुंची। PF धारकों के लिए सबसे अच्छा समय 1989 से 1999 तक था।

इस दौरान PF पर 12% ब्याज मिलता था। इसके बाद ब्याज दर में गिरावट आनी शुरू हो गई। 1999 के बाद ब्याज दर कभी भी 10% के करीब नहीं पहुंची। 2001 के बाद से यह 9.50% के नीचे ही रही है। पिछले सात सालों से यह 8.5% या उससे कम रही है।

मान लीजिए आपके PF अकाउंट में 31 मार्च 2023 तक कुल 5 लाख रुपए जमा हैं। ऐसे में अगर 8.10% की दर से ब्याज मिलता तो 5 लाख पर 40,500 रुपए ब्याज के रूप में मिलते। लेकिन अब ब्याज दर को बढ़ाकर 8.15% करने के बाद आपको 40,750 रुपए मिलेंगे।

फाइनेंशियल ईयर के आखिर में तय होती है ब्याज दर
PF में ब्याज दर के फैसले के लिए सबसे पहले फाइनेंस इन्वेस्टमेंट एंड ऑडिट कमेटी की बैठक होती है। यह इस फाइनेंशियल ईयर में जमा हुए पैसों के बारे में हिसाब देती है। इसके बाद CBT की बैठक होती है। CBT के निर्णय के बाद वित्त मंत्रालय सहमति के बाद ब्याज दर लागू किया जाता है। ब्याज दर का निर्णय फाइनेंशियल ईयर के आखिर में होता है। sabhar :bhaskar.com 

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सऊदी अरब और रूस ने भारत की अध्यक्षता वाली बैठक में सहमति क्यों नहीं बनने दी

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 दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले समूह जी-20 की अध्यक्षता इस साल भारत के पास है. भारत के पास जी-20 की कमान तब आई है, जब दुनिया यूक्रेन में रूस के हमले के कारण बुरी तरह से बँटी हुई है.

ऐसे में भारत को जी-20 की किसी भी बैठक में सहमति से कोई बयान या प्रस्ताव पास कराने में नाकामी हाथ लग रही है.

पिछले हफ़्ते गोवा में जी-20 देशों के बैठक में ऐसा ही हुआ. सऊदी अरब ने जीवाश्म ईंधन के सीमित इस्तेमाल को लेकर बैठक में आम सहमति नहीं बनने दी. सऊदी अरब को इसमें रूस का भी साथ मिला. ऐसा तब है जब रूस और सऊदी अरब भारत के बड़े तेल आपूर्तिकर्ता देश हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, सऊदी अरब के नेतृत्व में कई देशों ने जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करने के जी-20 देशों के इस क़दम का विरोध किया है.

इस क़दम को भविष्य में तेल, गैस और कोयले की भूमिका को लेकर वैश्विक तनाव का संकेत माना जा रहा है क्योंकि दुनिया जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही है.


गोवा में हुई बैठक के बाद जी-20 देशों की तरफ़ से एक सारांश दस्तावेज़ जारी किया गया है.


इस दस्तावेज़ में कुछ सदस्य देशों ने विभिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कटौती करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है जबकि कई देश इसके ख़िलाफ़ थे.


ये देश जीवाश्म ईंधन में कटौती करने के बजाय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए टेक्नोलॉजी के विकास पर ज़ोर देने की बात कर रहे हैं.

इस क़दम को भविष्य में तेल, गैस और कोयले की भूमिका को लेकर वैश्विक तनाव का संकेत माना जा रहा है क्योंकि दुनिया जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझ रही है.

गोवा में हुई बैठक के बाद जी-20 देशों की तरफ़ से एक सारांश दस्तावेज़ जारी किया गया है.

इस दस्तावेज़ में कुछ सदस्य देशों ने विभिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कटौती करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है जबकि कई देश इसके ख़िलाफ़ थे.

ये देश जीवाश्म ईंधन में कटौती करने के बजाय ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए टेक्नोलॉजी के विकास पर ज़ोर देने की बात कर रहे हैं.

जी-20 की बैठक में साल 2030 तक रिन्यूएबल एनर्जी यानी अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने का प्रस्ताव पेश किया गया था.

सऊदी अरब और रूस समेत प्रमुख जीवाश्म ईंधन उत्पादक देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है.

इसके अलावा कार्बन डाइऑक्साइड के सबसे बड़े उत्सर्जक चीन के साथ कोयला निर्यातक दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया है.

वहीं बात अगर भारत की करें तो समाचार एजेंसी रायटर्स के मुताबिक़, भारत ने इस मुद्दे पर अपना रुख़ तटस्थ रखा है.

बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध का भी ज़िक्र हुआ है. बैठक को लेकर जारी किए दस्तावेज में कहा गया है कि यूक्रेन में युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर और भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है.

रूस ने यूक्रेन में युद्ध को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई है और चीन ने विरोध करते हुए कहा कि जी20 सुरक्षा मुद्दों के समाधान के लिए सही मंच नहीं है.

बैठक के बाद केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह की तरफ़ से प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई.

इस दौरान उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि यह सम्मेलन जी-20 के इतिहास में सबसे सफल सम्मेलनों में से एक था. इसको लेकर हमारी पूरी सहमति थी. जहां तक ​​जी20 का सवाल है, हमारे बीच 29 में से 22 बातों (पैराग्राफ) पर सहमति थी और कुछ बातों को लेकर अहमति भी है.''

जीवाश्म ईंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर केंद्रीय मंत्री कहते हैं, ''कुछ देशों ने महसूस किया कि जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीक़े से कम करने के बजाय कार्बन कैप्चर और स्टोरेज के विकल्प भी मौजूद हैं जोकि वैध है. लेकिन, जी20 का बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन के बेरोकटोक उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने के पक्ष में था. इसलिए, इस पर कोई सर्वसम्मति नहीं बन पाई.''

सऊदी अरब-रूस को आपत्ति क्यों है?

आपत्ति के सवाल पर मनोहर पर्रिकर इंस्टिट्यूट फोर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनलिसिस में यूरोप एंड यूरेशिया सेंटर की असोसिएट फेलो स्वस्ति राव कहती हैं, ''जब-जब रिन्यूएबल एनर्जी के संसाधनों की तरफ़ बढ़ने को लेकर बात होती है तो ओपेक प्लस समूह के देश इसे सैद्धांतिक तौर पर इसका स्वागत करते हैं लेकिन असल में ये देश पूरी तरह से ऐसी पहल का समर्थन नहीं करते हैं. इसके पीछे की वजह जीवाश्म ईंधन पर इनकी अर्थव्यवस्था की निर्भरता है.''

अंतराष्ट्रीय मामलों के जानकार और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर रहे डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा का कहना है कि रूस और सऊदी अरब के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन (तेल और गैस) से आता है इसलिए दोनों देश कड़ी आपत्ति जता रहे हैं.

डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा कहते हैं, ''आपत्ति का पहला कारण राजस्व है. दूसरा कारण जलवायु परिवर्तन के लिए वित्तीय मदद देने पर सभी देशों में सर्वसम्मति नहीं है. तीसरा ऐसे मुद्दों पर एक राजनीतिक लॉबी होती है, जिसका असर सर्वसम्मति पर भी देखने को मिलता है.''

''जीवाश्म ईंधन का मामला सिर्फ़ रूस और सऊदी अरब तक सीमित नहीं है. अगर ट्रंप के समय देखें तो अमेरिकी सरकार भी इसका विरोध करती थी. कई बार उपभोक्ता भी ऐसे फ़ैसलों के ख़िलाफ़ दिखते हैं जैसा अभी चीन और इंडोनेशिया ने किया है.''

क्या ये भारत के लिए झटका है?

स्वस्ति राव सऊदी अरब और रूस के इस क़दम को भारत के लिए झटका नहीं मानती हैं. उनका कहना है कि यह घटना प्रत्याशित थी.

स्वस्ति राव कहती हैं, ''विकसित और विकासशील देश कार्बन उत्सर्जन को लेकर एक समान दृष्टिकोण नहीं हो सकता है क्योंकि दोनों की औद्योगिक परिपक्वता अलग-अलग है. विकसित देश कहते हैं कि हमें एक निर्धारित समय में नेट ज़ीरो का लक्ष्य प्राप्त करना है. इसके लिए विकसित देश क्लाइमेट फ़ाइनेंस के तहत विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर का फंड देने की बात भी करते हैं. इसके उलट विकासशील देश कहते हैं कि हमारे उद्योग-धंधे अब भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं इसलिए हमारे लिए अचानक से बदलाव कठिन है.''

स्वस्ति राव का कहना है कि ये अकेले इस जी-20 की बात नहीं है, ये समस्या पहले से चली आ रही है.

वहीं डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा मानते हैं कि अवधारणा के स्तर पर भारत को इससे नुक़सान होता है.

डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा बताते हैं, ''इतने बड़े मंच पर अगर आप किसी अहम मुद्दे पर सर्वसम्मति बनाने में सफल नहीं होते हैं तो अवधारणा के स्तर पर आपको नुकसान होता है लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिस्थितियां प्रतिकूल हैं तो पूरी तरह से विफलता नहीं मान सकते हैं.''

डॉ. प्रेम आनंद कहते हैं कि अगर ऐसी परिस्थितियों में कोई भी देश जी-20 की बैठक आयोजित करता है उसके सामने भारत जितनी ही मुश्किलें आएंगी.

क्या भारत को बाली समिट की तरह कामयाबी मिल पाएगी?

पूरी दुनिया की निगाहें सितंबर में भारत में होने वाली जी-20 समिट पर रहेंगी.

अब सवाल है कि अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बीच क्या भारत बाली समिट के बाद कामयाबी की एक और पटकथा लिख पाएगा?

डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि जी-20 समिट की सफलता काफ़ी हद तक वैश्विक परिस्थितयों पर निर्भर करती है.

डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा कहते हैं, ''बाली समिट के समय रूस-यूक्रेन युद्ध इतने बड़े स्तर पर नहीं पहुँचा था लेकिन अब स्थितियां काफ़ी बदल चुकी हैं. इसलिए भारत को बाली समिट के स्तर की सफलता मिलने के अवसर कम हुए हैं. सर्वसम्मति नहीं है तो सफलता नहीं है क्योंकि जब तक सर्वसम्मति नहीं होगी घोषणापत्र पर सहमति नहीं बन सकती है. आज हमारे संबंध रूस और अमेरिका दोनों से बहुत अच्छे हैं. इसके वाबजूद उम्मीदों के मुताबिक सर्वसम्मति नहीं बनी तो निश्चित रूप से वैसे कामयाबी नहीं मिलेगी जिसकी हमें आशा है.''

सफलता को लेकर स्वस्ति राव की राय डॉ. प्रेम आनंद मिश्रा से मिलती जुलती है. वो कहती हैं कि आज विश्व स्तर पर जी-20 के लिए जो बाधाएं हैं वो बाली समिट के दौरान नहीं थीं.

स्वस्ति राव कहती हैं, ''बाली समिट के दौरान ईंधन, खाद्य और उत्पादन का इतना बड़ा संकट नहीं था. अभी आप देखिए कि काला सागर अनाज समझौते से रूस बाहर निकल चुका है. इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिलेगा. भारत ने भी स्थिति को भांपते हुए अपने चावल के आयात पर रोक लगा दी है. ये सारी परिस्थितियां हमें एक जटिल दुनिया की तरफ़ ढकेल रही हैं.''

स्वस्ति राव आख़िर में कहती हैं कि हमें बाली समिट से तुलना करने की बजाय इस बात पर फोकस करना चाहिए कि इन कठिन परिस्थितियों में भारत कैसा प्रदर्शन करता है

.सऊदी अरब और रूस ने भारत की अध्यक्षता वाली बैठक में सहमति क्यों नहीं बनने दी

Sabhar :bbc.com 


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