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रविवार, 17 जनवरी 2021

शादीशुदा पुरुष किशमिश के साथ करें इस 1 चीज का सेवन, होते हैं ये जबर्दस्त 6 फायदे

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किशमिश के फायदे के बारे में आपने पहले भी जरूर पढ़ा होगा लेकिन यहां पर वैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित कुछ ऐसे बेहतरीन फैक्ट बताए जा रहे हैं जो शादीशुदा पुरुषों की जिंदगी को खुशनुमा बना सकते हमारे घर में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद होते हैं जिनका हम किसी विशेष पकवान के जरिए ही सेवन करते हैं। इन्हीं में से एक ऐसा ही खाद्य पदार्थ किशमिश है जो ड्राई फ्रूट की श्रेणी में आता है। इसका सेवन आमतौर पर लोग दूध के साथ ज्यादा करते हैं। जबकि शादीशुदा पुरुषों के द्वारा अगर किशमिश का सेवन एक अन्य फूड के साथ किया जाए तो यह बेहतरीन और जबर्दस्त फायदे पहुंचा सकता है। देखा जाए तो ज्यादातर घरों में यह चीज हमेशा मौजूद रहती है और लोग उसे अलग-अलग तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं।आइए अब सबसे पहले यह जानते हैं कि किशमिश का किस चीज के साथ सेवन करना है जिससे शादीशुदा पुरुषों को बेहतरीन फायदे मिल सकते हैं।: शादीशुदा पुरुष किशमिश के साथ करें इस 1 चीज का सेवन, होते हैं ये जबर्दस्त 6 फायदे" किशमिश के साथ शहद का सेवन किया जाए तो शादीशुदा पुरुषों को बेहतरीन फायदा मिल सकता है। इसके वैज्ञानिक कारण को अगर समझने की कोशिश की जाए तो यह और भी आसान हो जाएगा। दरअसल, किशमिश और शहद दोनों ही टेस्टोस्टोरोन बूस्टिंग फूड्स की श्रेणी में गिने जाते हैं। यह एक ऐसा हार्मोन है जो पुरुषों की सेक्सुअल समस्याओं को दूर करने और उनकी विभिन्न शारीरिक समस्याओं को दूर करने के लिए प्रभावी रूप से कार्य करता है। इसी गुण के कारण यह शादीशुदा पुरुषों के लिए और भी बेहतरीन साबित हो जाता है ऑफिस का वर्क लोड और कई सारी जिम्मेदारियां कुछ पुरुषों पर भारी पड़ जाती है। इसका असर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बढ़ता है बल्कि पौरुष शक्ति कमजोर हो जाने के कारण रोमांटिक लाइफ में भी खलल बढ़ जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए शहद और किशमिश के साथ आप चाहे तो दूध का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। एक हफ्ते तक लगातार इसका सेवन करने के बाद आपको खुद ही इससे होने वाले फायदे को महसूस करने लगेंगे। स्पर्म काउंट को बढ़ाने में जिन पुरुषों को लो स्पर्म काउंट की शिकायत है उन्हें सबसे पहले अल्कोहल और स्मोकिंग को पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। इसके बाद उन्हें अपने खाने पीने पर विशेष ध्यान देने की भी जरूरत होती है। वहीं, शहद और किशमिश का एक साथ किया गया सेवन प्रभावी रूप से स्पर्म काउंट को बढ़ाने में सक्रियरूप से अपना असर दिखाता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी लेकिन यह सच है कि इसकी कई प्रकार की क्वालिटी भी होती है। पतला स्पर्म मोटेलिटी की क्रिया में काफी धीमा होता है और इससे प्रजनन क्षमता पर भी विपरीत असर पड़ सकता है। जबकि शहद और किशमिश में ऐसे विशेष औषधीय गुण पाए जाते हैं जो स्पर्म की क्वालिटी को बेहतरीन बनाने में प्रभावी रूप से मददगार हो सकते हैं।पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है और इसकी चपेट में कई सारे लोग आ भी जाते हैं। जबकि वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार शहद और किशमिश दोनों में एंटी कैंसर गुण पाया जाता है। एंटी कैंसर गुण शरीर के किसी भी अंग में कैंसर सेल्स को विकसित होने से रोकती हैं और आपको कैंसर की चपेट में आने से बचाए भी रख सकती हैं। इस कैंसर से बचने के लिए भी आपको किशमिश और शहद के फायदे काफी लाभ पहुंचा सकते हैं।शरीर के विभिन्न अंगों का विकास होना बहुत जरूरी है। मांसपेशियों और कोशिकाओं के निर्माण के लिए हमें बेहद जरूरी और पावरफुल पौष्टिक तत्वों की जरूरत होती है। सेहतमंद बने रहने के लिए शहद और किशमिश का सेवन काफी लंबे समय से किया जा रहा है। जबकि इनमें मौजूद टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बूस्टिंग का गुण शारीरिक विकास को बढ़ावा देने में भी विशेष रूप से सहयोग प्रदान कर सकता है ब्लड प्रेशर की समस्या महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को ज्यादा परेशान करती है और यह उनकी दिनचर्या में शामिल खराब आदत व खानपान पर ठीक तरह से ध्यान न देने के कारण भी होता है। इससे बचे रहने के लिए शहद और किशमिश में मैग्नीशियम की मात्रा पाई जाती है जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में बेहतरीन पोषक तत्व की भूमिका निभाती है। आप इसे नियमित रूप से भी अपनी डायट में शामिल कर सकते हैं। साभार नवभारत टाइम्स

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शनिवार, 16 जनवरी 2021

कत्युर_राजवंश (पाल सूर्यवंशी )

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#कत्युर_राजवंश (पाल सूर्यवंशी )आज आपको उत्तराखंड के सबसे पुराने राजवंश से अवगत करवाते है ।उत्तराखंड पर आज तक कत्यूरियो के अतिरिक्त कोई भी राजवंश एकछत्र राज नही कर पाया चाहे गढ़वाल का परमार राजवंश हो या चंद राजवंश ।उत्तराखंड का सबसे पुराना राजवंश है ।कत्यूरियो के राज स्थापना के बारे मैं अलग अलग राय है ईसा के 2500 पूर्व से 7वी सदी तक इनका शासन एक छत्र रहा । उसके बाद चंद राजाओं ने इनके शासन का अंत किया ।इनकी राजधानी अस्कोट है कहा जाता है एक समय वह अस्सी कोट थे इस वजह से अस्कोट नाम भी पड़ा जो अब भी पिथोरागढ़ जिले में है ।कत्युरी प्राचीन सूर्यवंशी राजपूत माने जाते है शालिवाहन देव इनके मूल पुरुष है जो अयोध्या से आकर यहाँ अपना साम्राज्य बनाया । इनके राज्य का विस्तार पूर्व में सिक्किम से पश्चिम में काबुल तक था बंगाल में मिले शिलालेखो इनके शिलालेखों से मिलते है जिस से इनके राज्य के विस्तार के संभावना बनती है । कुछ शिलालेख बिहार के मुंगेर और भागलपुर से भी मिले है जो वैसे ही है जैसे शिलालेख कत्यूरियो के है एकमात्र सूर्य मंदिर जो उत्तराखंड में है वो कत्युरी राजाओ का ही बनाया हुआ है इसके आलावा अस्कोट का किला भी इन्होने ही बनवाया और भी कई किलो का निर्माण कराया नौले बनवाए शिव मंदिर बनवाये ।इस से राज्य विस्तार की उड़ीसा और बिहार तक होने की सम्भावनाये है । इसमें कोई संदेह नही की ये प्रतापी राजा हुए है । 13वी शताब्दी में इनकी एक शाखा भारी सेना लेकर नए राज्य स्थापना को अलखदेव और तिलकदेव के नेतृतव में गोंडा बस्ती गोरखपुर की और आई और अपना नया राज्य बसाया जो की महासु स्टेट के नाम से आज भी स्थित है जो की बस्ती जिला उत्तरप्रदेश में है ।चन्द राजाओ के आअने के बाद इनका राज्य छिन भिन्न हो गया कई जगहों से चंदो ने इनको निकाल भगाया कई जगहों पर ये चंदो के अधीन छोटे मोटे जमींदार या प्रशासक बन गये ।राजघराने के लोग अब रजबार कहलाते है रजबार मल्ल ,शाही,बम,मनराल, कड़ाकोटि,कैंतुरा गुसाई आदि शाखाओ में बंट गये शाही --अर्जुनदेव के वंशज । चोकोट के रजबार -किशनदेव के वंशज । मनराल -लाडदेव के वंशज । डोटी के मल्ल - नागमल्ल के वंशज । कुछ लोग गुसाई पदवी का प्रयोग सरनेम की तरह करते है । चोकोट में इनकी कुलदेवी का मन्दिर है कुछ लोग मनिला देवी को भी इनकी कुलदेवी कहते है जो सल्ट पट्टी अल्मोड़ा मे है । यधपि पोस्ट में सभी जानकारिया जांच परख कर तथ्यों को देखते हुए दी गयी है यदि कुछ जानकारी पर संदेह हो तो कमेंट में तथ्यों के साथ बताये । https://palrajvancehariharpur.blogspot.com

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कत्यूरी राजवंश: उत्तराखण्ड का शक्तिशाली साम्राज्य

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>कत्यूरी राजवंश ने उत्तराखण्ड पर लगभग तीन शताब्दियों तक एकछत्र राज किया. कत्यूरी राजवंश की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने अजेय मानी जाने वाली मगध की विजयवाहिनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. (Katyuri Dynasty of Uttarakhand) कत्यूरी राजवंश की पृष्ठभूमि, प्रवर्तक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में उभरने का कोई प्रमाणिक लेखा-जोखा नहीं मिलता है. यह इतिहासकारों के लिए अभी शोध का विषय ही है. इस सम्बन्ध में मिलने वाले अभिलेखों से कत्यूरी शासकों का परिचय तो मिलता है लेकिन इसके काल निर्धारण में सहायता नहीं करते. इसी वजह से कत्यूरी शासन के कालखंड को लेकर इतिहासकारों में मतभेद बने हुए हैं. कहा जाता है कि कत्यूरी शासक अयोध्या के सूर्यवंशियों के वंशज थे, हालाँकि इसका भी सुस्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. कत्यूरों ने स्थानीय खश शासकों को पराजित करके यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया था. इतिहासकारों का मानना है कि इसके प्रथम शासक प्रतापी राजा ललित सूरदेव हुए. ललित सूरदेव से लेकर वीरदेव तक कत्यूरों की 13 पीढ़ियों ने उत्तराखण्ड में शासन किया, हालाँकि इसका क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता. माना जाता है कि कत्यूरी शासन का आरंभ 850 ई. के लगभग हुआ, जो कि 1015 तक रहा. लेकिन समुद्रगुप्त (335 से 375 ई.) के मंत्री हरिषेणकृत प्रयाग स्तम्भ पर उत्कीर्ण प्रशस्ति के अनुसार कर्तिकेयपुर का राज्य अन्य सीमावर्ती राज्यों से समृद्ध राज्य था. इसके अवशेष आज भी बैजनाथ में रणचूलाकोट, तैलिहाट, सेलिहाट में देखे जा सकते हैं. कत्यूरी साम्राज्य का विस्तार पूर्व में डोटी से लेकर पश्चिम में यमुना तक तथा उत्तर में मानसरोवर से दक्षिण में रूहेलखंड तक हुआ करता था. कत्यूरी शासनकाल में कलाकौशल के क्षेत्र में भारी तरक्की हुई. इस दौरान कई भव्य मंदिरों, मूर्तियों तथा उत्कृष्ट शिल्प वाले भवनों का निर्माण हुआ. (Katyuri Dynasty of Uttarakhand) कत्यूरी साम्राज्य का प्रशासनिक ढांचा गणतांत्रिक हुआ करता था. इसका संचालन 18 सदस्यों वाली ‘अधिष्ठान’ द्वारा किया जाता था. उत्तरवर्ती काल में इसकी जगह ‘रजबार अधिष्ठान’ ने ले ली, जिसे 12 राजाओं की सभा भी कहा जाता था. इतिहासकारों के अनुसार कत्यूरों की राजधानी मूलतः जोशीमठ में हुआ करती थी, जिसे ब्रह्मपुर नाम से पहचाना जाता था. राजा असन्तिदेव के समय में इसे कत्यूर (बैजनाथ) में स्थानांतरित कर दिया गया. अटकिंसन ने अस्कोट, डोटी, पालीपछाऊँ से प्राप्त गुरुपादुका नामक पुस्तक के आधार पर एक चौथी वंशावली का भी वर्णन किया है. इसे अन्य तीनों की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें वंशावली के अलावा कई राज कर्मचारियों के अलावा महत्वपूर्ण राजनीतिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन भी मिलता है. इसके अनुसार जोशीमठ से शासन करने वाले कत्यूरी शासक थे— 1. अग्निराय, 2. फेलाराय, 3. सुबतीराय, 4. केशवराय, 5. बगड़राय, 6. आसन्तीराय, 7. वासन्तीराय, 8. गोरारे, 9. श्यामलराय, 10. इलणा देव, 11. प्रितमदेव, 12. धामदेव. प्रख्यात इतिहासकार मदनचन्द्र भट्ट के अनुसार के अनुसार कट कत्यूरी युग 1200 से 1545 ई. तक माना जा सकता है. इस समय कत्यूरी शासन की राजधानी रणचूलाकोट में थी. इसी के पश्चिम में 2 राजधानियां वैराट (चौखुटिया और लखनपुर) थी तथा पूर्व में हाटथर्प (डीडीहाट) और ऊकू (नेपाल) थीं. रामायण प्रदीप के अनुसार देवलगढ़ का राजा अजयपाल (1500 से 1548 ई.) कत्यूरियों का सोने का सिंहासन छीनकर श्रीनगर ले गया था. अतः कत्यूरी राज्य का पतन अजयपाल के अभुदय के बाद ही हुआ. sabhar:https://www.kafaltree.com/katyuri-dynasty-uttarakhand

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विज्ञान और अध्यात्म

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विज्ञान का सफर आदि काल से शुरू हो गया था | जब मनुष्य कृषि और पत्थर के औंजारो का प्रयोग किया विज्ञान ने जहा हमे तकनीको के द्वार खोल कर जीवन को सरल एवं सुगम्य बनाया है परंतु अध्यात्म के विना जीवन मे शांती नहीं मिल सकती कही ना कही विज्ञान और अध्यात्म एक हो जाते है आगे देखे कैसे तकनीक ने हमारा जीवन आसान कर दिया है विज्ञान और आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है। वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी। अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांड का अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है। हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है। हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है | ईश्वर को अनन्त माना गया है , और उसकी लीलाओ को अनन्त कहा गया है | धर्म के अनुसार ईश्वर का वास हर कण मे है और उसकी माया अनन्त है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है | उन्होने अपनी पिछली पुस्तक “द एम्पर्स न्यू माएंड ” मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब ” साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स ” मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है |आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक ‘एओन ‘ या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है | भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है तो क्या वैज्ञानिक कही ना कही ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे

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क्या इस ब्रह्मांड में हमारे सिवा भी कोई और है

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गुजरे वर्ष में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया तथा कार्नेजी इंस्टिट्यूट ऑफ़ वाशिंगटन से संबंध का गोल विद के एक दल को एक जीवन अनुकूल ग्रह की खोज करने में सफलता मिली जिसे ग्लास 510 नाम दिया गया है हालांकि अब तक सौरमंडल के बाहर सैकड़ों ग्रहों की को खोजा जा चुका है लेकिन इस नए खोजे गए ग्रह के बारे में यह कहा जा रहा है कि जीवन के पनपने योग्य तमाम परिस्थितियों की दृष्टि से यह सर्वाधिक अनुकूल है ग्लास 581 ग्रह का मूल तारा है लाइफ 581 जो एक लाल बोना तारा है यह ग्रह 37 दिन में अपने मूल तारीख की एक प्रतिमा पूरी करता है गौर मतलब है कि लाइफ 581 की ग्रह मालिका प्लेनेटरी सिस्टम में भी और भी ग्रह पाए गए हैं लेकिन ग्लास 581 जी को ही जीवन के अनुकूल पाया गया है हवाई स्थित टेलीस्कोप की मदद से लगातार 11 वर्षों के परीक्षण के बाद लाइफ 58 15 मालिका में आईसीटी ग्रह की खोज करने में सफलता मिली पृथ्वी से 20 प्रकाश वर्ष की दूरी पर तुला तारामंडल में स्थित यह ग्रह पृथ्वी से 3 गुना बड़ा है लेकिन इसका ग्रुप टेबल पृथ्वी के मुकाबले कहीं कम है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसंधानकर्ताओं को बीते वर्ष में कैलीफोर्निया की एक झील में  arsanik पर पलटने वाले जीवाणुओं यानी बैटरी या की एक प्रजाति की खोज करने में सफलता मिली सौरमंडल से बाहर जीवन अनुकूल ग्रह की खोज के साथ बैक्टीरिया की इस नई प्रजाति की खोज में फिर से इस तथ्य को रेखांकित किया है कि दुर्गम से दुर्गम और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन पनप सकता है तो क्या इस ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं यानी हमारे सिवा भी कोई और है

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इस डिवाइस के आते ही बदल जाएगा सेक्स लाइफ

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वायग्रा और सेक्‍स पिल्‍स के साइड इफेक्‍ट को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इन दिनों एक ऐसा डिवाइस बनाया है जो सेक्‍स लाइफ को लंबे समय तक स्‍पाइसी बनाए रखता है। वैज्ञानिक इन दिनों एक ऐसे डिवाइस पर काम कर रहे हैं जिसे दिमाग में फिट किया जा सकेगा और इससे सेक्स का आनंद कई गुना बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों ने इसका नाम सेक्‍स चिप रखा है। प्रयोग के तौर पर वैज्ञानिकों ने इस चिप को एक ऐसे महिला के दिमाग में इंप्‍लांट कर दिया जिसे सेक्‍स में कोई इंटरेस्‍ट नही था। मगर इस चिप के इंप्लांट के बाद उसकी सेक्स रिलेटेड इच्छाएं तेजी से बढ़ गईं। बाद में इस चिप को निकाल दिया गया, क्योंकि वह सामान्‍य लाइफ और सेक्‍स लाइफ के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रही थीं। ऑक्सफर्ड में जॉन रेडक्लिफ हॉस्पिटल के प्रोफेसर टीपू अजीज का कहना है कि सेक्स चिप 10 सालों के भीतर एक सचाई बन सकती है। उनका कहना है कि इस चिप की सफलता के सबूत भी हैं। उनका कहना है कि यह तकनीक वायरलेस होगी और सेल्फ पावर्ड ब्रेन चिप्स के सहारे चले sabhar baskar.com

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गुरुवार, 14 जनवरी 2021

दिल की धड़कन से चलेंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

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 चीन के वैज्ञानिक एक ऐसी सुरक्षा तकनीक विकसित कर रहे हैं जिसमें दिल की धड़कन की मदद से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को संचालित किया जा सकेगा ताइवान के टाइम है है सिंह यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि हर एक इंसान का दिल अलग तरीके से धड़कता है वैज्ञानिकों का कहना है जब तक व्यक्ति जीवित रहता है उसके दिल की धड़कन ए चालू रहती है ऐसे में धड़कनों को करती है प्रणाली में बदलकर कंप्यूटर सुरक्षा तकनीकी हथियार के रूप में विकसित किया जा सकता है दिल अलग तरीके से धड़कने के कारण हर एक व्यक्ति का की दिल की धड़कन का इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम संकेत भी अलग होता है वास्तव में किन्ही दो व्यक्तियों को इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम संकेत एक जैसे नहीं होते इसी विशेषता को नए बायोमेट्रिक हथियार के रूप में विकसित किया जा रहा है प्रमुख शोधकर्ता सुन लिया मैंने कहा है कि इस तकनीकी योग्यता जांचने के लिए हमने 2 लोगों के ; इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम अर्थात ईसीजी संकेतों को उनकी हथेलियों के माध्यम से प्राप्त किया फिर उन्हें गणितीय आंकड़ों में परिवर्तित किया लिन ने कहा हमने पाया कि इन आंकड़ों का इस्तेमाल पासवर्ड के रूप में किया जा सकता है उनका दावा है कि यह अन्य प्राणियों के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षित है अब तक बायोमेट्रिक पहचान सुनिश्चित करने के लिए उंगलियों के निशान आंखों की पुतली का इस्तेमाल होता था इसके बावजूद लोग तस्वीर में से इसे धावली करते हुए पाए गए लेकिन इस तकनीकी में हथेलियों से रिकॉर्ड की गई है दोनों को एक बार करने के बाद हमेशा पासवर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है इसमें धोखाधड़ी किए जाने की आशंका नहीं होगी

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कुत्ते से हुआ प्यार, साइंस की छात्रा ने कर दी सारी हदें पार!

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अहमदाबाद।शहर के पॉश इलाके में रहने वाली और साइंस (कक्षा 12वीं) की एक छात्रा का एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। छात्रा को अपने घर पर पले कुत्ते से इस कदर प्यार हो गया कि अब वह उसे अपना ब्वॉयफ्रेंड मानने लगी है।  छात्रा कुत्ते को लेकर सारी हदें पार कर चुकी है। बताया जाता है कि छात्रा के कमरे से उसके परिजनों को अश्लील साहित्य भी मिले हैं। मजबूरीवश अब परिजनों को मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी है। लगभग 5 वर्ष पहले छात्रा के पिता जर्मन शैफर्ड ब्रीड के एक कुत्ते को घर लाए थे। जैसे-जैसे कुत्ता बड़ा होता गया, छात्रा का उससे प्रेम उतना ही बढ़ता गया। अब तो स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि छात्रा रात-दिन कुत्ते के साथ ही रहती थी और उसे कुत्ते से एक पल के लिए भी दूर रहना पसंद नहीं। कुत्ते को लेकर छात्रा का पागलपन इस कदर बढ़ चुका था कि यह बात उसकी सहेलियों तक को पता थी। इन्हीं में से एक सहेली ने यह बात परिजनों बता दी, तब जाकर इस मामले का खुलासा हुआ। पिता ने यह बात सुनते ही कुत्ते को एक स्वैच्छिक संस्था को सौंप दिया। लेकिन छात्रा कुत्ते के प्यार में इस कदर पागल थी कि उसने परिजनों को धमकी दे दी कि अगर कुत्ते को वापस नहीं लाया गया तो वह आत्महत्या कर लेगी। इकलौती बेटी की इस हरकत से परिजन भी घबरा गए और कुत्ते को घर वापस ले आए। परिजन कुत्ते को वापस तो ले आए लेकिन अब उन्होंने कुत्ते को एक पिंजरे में रखना शुरू कर दिया है और उसकी देखभाल के लिए एक वॉचमैन भी रखना पड़ा है।इधर, कुत्ते से अलग रहने पर छात्रा की मानसिक हालत बिगड़ गई और वह डिप्रेशन में चली गई। अन्य चिकित्सकों की सलाह पर पिता ने उसे शहर के जाने-माने मनोचिकित्सक को दिखाया है।
छात्रा के कमरे से मिले अश्लील साहित्य:   पुत्री के कुत्ते से इस कदर प्रेम के चलते परिजनों ने जब उसके कमरे और सामानों की तलाशी ली तो काफी मात्रा में अश्लील साहित्य भी बरामद हुआ है।
यह बीमारी ‘जूफिलिया’ कहलाती है:   चिकित्सीय भाषा में इस बीमारी को जूफिलिया (जानवरों से अत्यधिक प्रेम व संभोग की स्थिति) कहा जाता है। इसकी शुरुआत ‘अनकंडिशन लव’ के रूप में होती है जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए अंत तक ‘अनकंडिशनल फिजिकलिटी’ में बदल जाती है। पशु के प्रति बढ़ता प्रेम, संभोग तक पहुंच जाता है, जिसे ‘सैक्सुअल परवरजन’ भी कहा जाता है। विज्ञान में इस समस्या का निदान सिर्फ मनोवैज्ञानिक तरीके से ही संभव है।

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विशिष्ट गुणों वाली जीएम फसलों का विकास

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आईसीएआर और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विशिष्ट गुणों वाली जीएम फसलों का विकास किया है फसलों में विभिन्न रोगों की रोकथाम में जीन संपादन द्वारा सफलता प्राप्त करने के बाद वैज्ञानिक अब सूखा  
 चार पाला और लवण रोड़ी फसलों के विकास के साथ ही खनिज संपदा से भरपूर प्रजातियों के विकास के लिए कार्य कर रहे हैं भारत में सूखा रोधी धान और सरसों की किस्मों पर जीनों के फेरबदल के प्रयोग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और दिल्ली विश्वविद्यालय में किए जा रहे हैं पूसा में डीएम चोपड़ा और उनकी टीम ने सरसों की जय किसान नामक प्रजाति का विकास सोमैक्लोनल  वेरिएशन तकनीक
से किया सरसों की फसल सुखा रोटी और अगेती होने के कारण किसानों द्वारा पसंद की गई इसी प्रकार चेन्नई के एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाऊंडेशन की प्रयोगशाला में समुद्र के खारे पानी को चाहने वाले जीन को समुद्री maigro tree से अलग करके तंबाकू में सफलतापूर्वक प्रवेश किया गया  अब उसे paddy में प्रविष्ट करा दिया गया है इस प्रकार समुद्र के खारे पानी से धान पैदा होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं  भारत में कोल्ड स्टोरेज कोल्ड चीन की सुविधा की कमी और अनियमित बिजली आपूर्ति के कारण फल फूल और सब्जियों को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता ऐसी स्थिति में यदि जिलों के फेरबदल से इन फसलों को अधिक देर तक टिकाऊ ताजा और सुरक्षित बना दिया जाए तो किसानों के साथ-साथ वक्ताओं को भी लाभ होगा वैज्ञानिक इस दिशा में कार्य कर रहे हैं स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने रॉकफेलर प्रतिष्ठान की सहायता से धान की गोल्डन राइस किस्म को विकसित किया है इसमें विटामिन ए पैदा करने वाला जीन डाला गया है फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने अधिक लोहे और जस्टिस से युक्त धान के बीजों का विकास किया है यह बी एनीमिया से ग्रस्त बच्चों और महिलाओं के लिए वरदान सिद्ध होगा जीएम फसलों के उत्पादन बढ़ाया जा सकता है वैज्ञानिक शोध पर आधारित विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विकासशील देशों में जीएम तकनीक से प्रायः सभी फसलों का उत्पादन 25% बढ़ाया जा सकता है चीन के किसानों ने 1997 से बीटी कपास हुआ कर कपास उत्पादन लागत को 8% कम किया है दुनिया में एक तिहाई सिंचित क्षेत्र सिर्फ इस लिए खेती के लिए अनुपयुक्त हो गया है क्योंकि वहां की जमीन छारीय हो चुकी है ऐसी जमीन पर जीएम फसलों को उगाया जा सकता है यह फसलें सूखे को भी काफी हद तक सहन करने के योग्य होती हैं सबसे बड़ी बात है कि हम जीएम फसलों को पूर्णता कृतिम वातावरण में उगने लायक बना सकते हैं

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कया ब्रमांड पहले से था और रहेगा

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वैसे तो ब्रह्मांड के निर्माण के संबंध में कई सिद्धांत और और धारणाएं प्रचलित है लेकिन महा विस्फोट के संबंधी अवधारणा को सबसे ज्यादा मान्यता मिली है और आप सभी आमतौर पर इसे स्वीकारते हैं बिग बैंग थ्योरी के अनुसार अरबों साल पहले यह ब्रह्मांड अत्यधिक घनीभूत अवस्था में था और एक बिंदु के रूप में था इस बिंदु को वैज्ञानिकों ने विलक्षणता का बिंदु कहा इस बिंदु में एक महा विस्फोट हुआ इसका विस्तार होना शुरू हो गया इस महा विस्फोट ने अति सघन बिंदु बिंदु को छिन्न-भिन्न कर दिया और इस पिंड के टूटे हुए हंस अंतरिक्ष में दूर-दूर तक छुट्टी है अभी भी हजारों किलो मीटर प्रति सेकेंड की दर से गतिमान है इन्हीं गतिशील आंसुओं से अकाश गंगा निर्मित हुई है और ब्रह्मांड का वर्तमान स्वरूप सामने आया हरमन बॉडी गोल्ड पायल नाम के तीन सिद्धांत दिया इस सिद्धांत में एक सी फील्ड वहां से फील्ड का मतलब क्रिएशन यानी निर्माण से है कि कल्पना की गई बहुत ही घने हो मुझे द्रव्यमान वालों के आसपास मौजूद इस फील्ड की ऊर्जा को और बना देता है जिससे पदार्थ का निर्माण होता है इस प्रक्रिया में उर्जा में बढ़ोतरी के साथ में भी बढ़ोतरी होती है जिससे तेज गति के साथ बाहर करता है इससे छोटे स्तर पर विस्फोट की होती है छोटे छोटे बड़े विस्तार होता है इस प्रकार की संरचना होती है हरमन बॉडी थम्स गोल्ड रेट हायर नामक के तीन ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने महा विस्फोट के इस सिद्धांत को चुनौती दी उन्होंने 1948 में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के एक नए सिद्धांत को प्रस्तुत किया जिसे अस्थाई अवस्था सिद्धांत कहा जाता है इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का ना तो महा विस्फोट के साथ आरंभ हुआ ना ही कभी इसका अंत होगा यानी इस विशाल ब्रह्मांड का ना आदि है न अंत इस सिद्धांत के अनुसार आकाशगंगा ए आपस में दूर तो हो जाती है

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रविवार, 10 जनवरी 2021

चीनी वैज्ञानिकों ने खोजा ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदियों का उद्गम

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 ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाने समेत तिब्बत में कई जल परियोजनाओं को अंजाम देने के लिए तैयार बैठे चीन के वैज्ञानिकों ने तिब्बत की सीमा से बहने वाली नदियों के उद्गम स्थल और उनके मार्ग की लंबाई का व्यापक उपग्रह अध्ययन पूरा कर लिया है चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिकों ने ब्रह्मपुत्र के मार्ग की उपग्रह से ली गई तस्वीरों का विश्लेषण करने के साथ भारत पाकिस्तान से बहने वाली सिंधु और म्यांमार के रास्ते बहने वाली सालवीन और इरावडी के बहाव के बारे में भी पूरा विवरण उठा लिया है सी ए एस के तहत आने वाली इंस्टीट्यूट आफ रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन के शोधकर्ता न्यू साउथ शिवांग ने बताया कि इसके बाद पहले 4 नदियों के उद्गम कभी स्पष्ट नहीं हुए थे और इनकी लंबाई क्षेत्र के बारे में आ रहे विभिन्न जानकारियों ने शोधकर्ताओं को कई साल तक भ्रम में रखा था क्योंकि इस कार्य में प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़ी कई बाधाएं आती थी और सर्वेक्षण की तकनीक भी सीमित थी न्यू ने अपने विश्लेषण के आधार पर बताया कि ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल तिब्बत के दौरान काउंटी स्थित हिमालय पर्वत के उत्तरी क्षेत्र में स्थित सांसी ग्लेशियर है न कि सीमा युंग डुंग ग्लेशियर इसे भूगोल विद स्वामी प्रणवानंद ने 1930 के दशक में ब्रह्मपुत्र का उद्गम बताया था

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