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शनिवार, 7 जनवरी 2012

स्टीव जॉब्स के होने और न होने का साल

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कंप्यूटर युग ने नई तकनीक और खोज के संसार में एक कद्दावर चेहरे को 2011 में 56 साल की छोटी उम्र में मरते देखा. एप्पल को जन्म देने वाले स्टीव जॉब्स की अक्टूबर में मौत तकनीकी दुनिया के लिए बहुत बड़ा सदमा रही.

 
स्टीव जॉब्स की मौत ऐसे वक्त में हुई जब एप्पल, दिग्गज तेल कंपनी एक्सॉन मोबिल को टक्कर देते हुए दुनिया की सबसे प्रभावशाली कंपनियों में शुमार हुई और उनकी कामयाबियों की तुलना अमेरिका के सर्वकालिक बड़ी खोज करने वाले थॉमस एडिसन और हैरिसन फोर्ड से की जा रही थी. जॉब्स की मौत के बाद के हफ्तों में अनगिनत बार कंप्यूटर, संगीत, डिजिटल सिनेमा, स्मार्ट फोन और टैबलेट कंप्यूटर में उनके लाए बदलावों की चर्चा होती रही. पर सोचने वाली बात यह थी कि एप्पल और तकनीक की दुनिया में स्टीव जॉब्स की दृष्टि और सोच शामिल नहीं हुई होती तो क्या होता.
जॉब्स की मौत के बाद एप्पल के शेयरों की कीमत में भारी गिरावट जरूर आई लेकिन जल्दी ही यह ऊपर चढ़ गया. निवेशकों को जल्दी ही पता चल गया कि दूरदर्शी जॉब्स ने अपने पिछले कई साल अपनी विरासत को संभालने वाले हाथों को तैयार करने में खर्च किए हैं. जॉब्स ने पहले से ही आने वाले समय के लिए एप्पल का खाका खींच रखा है. यहां तक की जॉब्स ने एक गुप्त एप्पल यूनिवर्सिटी भी बना रखी थी जो उनके टॉप एग्जिक्यूटिव्स को पढ़ाती थी. जब उन्होंने टिम कुक को अपने वारिस के रूप में नियुक्त किया तभी यह भी तय कर दिया कि जॉनी इवे की कुर्सी सुरक्षित रहे. जॉनी एप्पल के डिजाइन चीफ हैं.
जॉब्स की तैयारी कितनी तगड़ी है इसे इससे भी समझा जा सकता है कि उनकी मौत के कुछ ही दिन बाद बाजार में उतरा आईफोन 4एस रिकॉर्ड तोड़ बिक्री को हासिल कर गया वो भी तब जबकि पिछले फोन की तुलना में इसे बस कुछ मामूली सुधारों के साथ पेश किया गया. तकनीक के जानकार अब उम्मीद कर रहे हैं कि आईफोन 4एस में पेश किए गए सिरी और दूसरे वॉयस सिस्टम कंप्यूटर और लैपटॉप को नियंत्रित करने के तरीकों में जल्दी ही भारी लोकप्रियता हासिल कर लेंगे. ऐसी भी उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही इसके जरिए इंटरएक्टिव टीवी की भी शुरूआत हो सकेगी जिसका मनोरंजन की तकनीक को काफी लंबे समय से इंतजार है.
तकनीक के चाहने वालों के लिए एक और अच्छी खबर यह है कि इस दिशा में दिमाग लगाने वालों में जॉब्स अकेले नहीं हैं. माइक्रोसॉफ्ट ने दिसंबर की शुरुआत में एक अपडेट लॉन्च किया जो पांच करोड़ से ज्यादा लोगों के लिविंग रूप में मौजूद एक्बॉक्स 360 को आवाज से नियंत्रित होने वाले इंटरैक्टिव टीवी मॉड्यूल में बदल देगा. जॉब्स के पुराने प्रतिद्वंद्वी बिल गेट्स के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है लेकिन कई दूसरे कारोबारी भी जॉब्स की जगह लेने को बेचैन हैं. गूगल के सर्गे ब्रिन और लैरी पेज ने तो इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की जिंदगी बदल ही दी है, फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग ने इंटरनेट के जरिए संपर्कों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है. इन तीनों का एक ही मंत्र है और वो यह है कि कंप्यूटर क्रांति और उसमें उनकी जगह बस शुरू ही हुई है.

अब गूगल को ही देखिए उसने वेब की दुनिया में तो लगातार नई चीजों का शामिल करना जारी रखा ही है उसने वैकल्पिक ऊर्जा और परिवहन तंत्र में भी नई खोजों को शामिल करना शुरू कर दिया है. गूगल की खुद से चलने वाली कार का आने वाले समय में लोगों की आवाजाही पर क्रांतिकारी असर हो सकता है. ठीक वैसे ही जैसे कि कंप्यूटर इस्तेमाल करने वालों के लिए कोई जानकारी ढूंढने की दिशा में हुआ है.
इन लोगों ने एप्पल के लिए पहले ही चुनौतियां पेश करनी शुरू कर दी है. गूगल का एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर अब दुनिया भर में ज्यादातर स्मार्टफोन्स के साथ काम करता है. कई लोगों का मानना है कि इस्तेमाल में यह आईफोन के जैसा ही है. इसी तरह आईपैड भी अब सिर्फ एप्पल की मिल्कियत नहीं रही. नवंबर में लॉन्च हुए अमेजन के किंडल फायर के 20 लाख टेबलेट बिक चुके हैं और उसके साथ दूसरी कंपनियों के टेबलेट की भी कतार लगी है.
आने वाले दौर में तकनीक की दुनिया पर कब्जे की होड़ क्या रंग लाएगी इस पर जानकारों की राय बंटी हुई है. एप्पल के शेयर अप्रैल में अपनी सर्वकालिक ऊंची कीमत 426 डॉलर से फिलहाल नीचे चल रहे हैं. तकनीकी बाजार के जानकार लियोनिड कानोप्का को लगता है "एप्पल का बुलबुला फूट चुका है." उनकी मानें तो शेयरों के भाव 100 डॉलर से भी नीचे आएंगे. उधर दूसरे जानकार एंडी जेकी का कहना है कि सभी ब्लू चिप कंपनियों के बीच एप्पल के शेयरों की कीमत सबसे कम लगाई गई है. आखिरकार एप्पल की सफलता उसके सामानों की ब्रैंडिंग पर निर्भर करती है.
फिलहाल तो यही लगता है कि भविष्य का ख्याल रख लिया गया है. क्रिसमस पर अमेरिकी बच्चों में कराए सर्वे में टॉप तीन इलेक्ट्रॉनिक गजट के बारे में पूछने पर 6-12 साल की उम्र के बच्चों ने सारे नाम एप्पल से जुड़े लिए. सर्वे के नतीजे बताते हैं कि 44 फीसदी बच्चे आईपैड चाहते हैं, जबकि 30 फीसदी बच्चे आईपॉड टच और 27 फीसदी बच्चों ने आईफोन के लिए चाहत दिखाई.
रिपोर्टः डीपीए/एन रंजन sabhar :www.dw-world.de
संपादनः महेश झा

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समुद्र में लौट रहे हैं मूंगे के जंगल

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बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए समुद्री संसाधनों का भी इस्तेमाल बढ़ गया है, जिसकी वजह से समुद्र में कोराल समाप्त हो रहे हैं. एक जर्मन वैज्ञानिक से प्रेरणा लेकर अब उसे बचाने का काम चल रहा है.

 
साइनायड फिशिंग और पानी के बढ़ते तापमान के कारण इंडोनेशिया के बाली में कोरल या मूंगे कम हो रहे थे, लेकिन एक गोताखोर ने जर्मन वैज्ञानिक की किताब बायोरॉक से प्रभावित होकर एक परियोजना बनाई है, जिसे दुनिया भर में लागू किया जा रहा है. जिन 20 देशों में इस पर अमल हो रहा है उनमें दक्षिण पूर्व एशिया, कैरिबियन, हिंद महासागर और प्रशांत सागर के देश शामिल हैं.
बाली के उत्तरी तट पर पेमुतेरान के नीले पानी में इस परियोजना को 2000 में शुरू किया गया था. वहां क्रैब नाम का एक लोहे का फ्रेम है, जिसे विभिन्न प्रकार के कोरल से ढक दिया गया है, जिसमें सैकड़ों मछलियों ने अपना घर बना लिया है. मूंगे छोटे समुद्री जीव होते हैं जो लाखों की संख्या में समूह में रहते हैं और अपने इर्द गिर्द सख्त शंख बना लेते हैं जो पत्थर जैसे और अलग अलग रंगों के होते हैं. इन्हें तराश कर और चमका कर मूंगे के जेवर भी बनाए जाते हैं.
अपने प्रयासों की सफलता पर जर्मन मूल की ऑस्ट्रेलियाई नागरिक रानी मोरो वुइक को नाज है. उन्होंने पहली बार 1992 में पेमुतेरान में उसके सुंदर मूंगों को देखने के लिए गोताखोरी की थी. लेकिन 90 के दशक का अंत होते होते गर्म होते पानी के कारण कोराल रीफ लुप्त होने के कगार पर पहुंच गए. उन पर साइनायड और डायनामाइट से भी असर पर रहा था.
रानी कहती हैं कि वे बहुत दुखी हुईं. "सारा कोराल मर चुका था, वह बजरी और रेत में बदल गया था." लेकिन जब जर्मन समुद्री वैज्ञानिक वोल्फ हिलबैर्त्स ने उन्हें अपनी 1970 की खोज के बारे में बताया, गोताखोर रानी के कान खड़े हो गए. हिलबैर्त्स ने निर्माण सामग्री को समुद्र में उगाने का परीक्षण किया था. इसके लिए उन्होंने धातु का एक ढांचा समुद्र में डालकर उसे कम वोल्टेज बिजली से जोड़ दिया था. उसके बाद इलेक्ट्रोलाइसिस से चूना पत्थर बनना शुरू हुआ. जब हिलबैर्त्स ने अमेरिका के लुइजियाना में अपना परीक्षण किया तो उन्होंने पाया कि सीप और घोंघे ने सारी संरचना को ढक दिया है और चूना पत्थर पर घर बसा लिया है. और शोध करने पर यह कोरल के साथ भी संभव बना.
जमैका के समुद्र विज्ञानी थोमस गोरे कहते हैं, "कोरल दो से छह गुने तेजी से बढ़ते हैं. हम कुछ साल के अंदर रीफ को फिर से पैदा कर सकते हैं." गोरे ने 1980 के दशक में हिलबैर्त्स के साथ काम करना शुरू किया और चार साल पहले हिलबैर्त्स की मौत तक अपना सहयोग जारी रखा. जब रानी ने इस खोज को देखा तो उनके मन में विचार आया कि यह उनके समुद्र को भी बचा सकता है. अपना पैसा खर्च कर उन्होंने तमन सारी रिजॉर्ट की मदद से 22 ढांचो वाला प्रोजेक्ट बनाया.
अब पेमुतेरान खाड़ी में दो हेक्टेयर में फैले इस तरह के 60 पिंजड़े हैं और रीफ को बचा तो लिया ही गया है, वह अब और बढ़ रहा है. रानी कहती हैं, "अब हमारे पास पहले से बेहतर कोरल गार्डन है." स्थानीय मछुआरों ने भी इस परियोजना का फायदा देख लिया है. कॉलेज पास करने के बाद इ प्रोजेक्ट में शामिल होने वाली कोमांग अस्तिका कहती हैं, "शुरू में मछुआरे बायोरॉक प्रोजेक्ट नहीं चाहते थे. वे कहते थे कि यह उनका समुद्र है. अब वे मछली को वापस होते देख रहे हैं और पर्यटक भी वापस लौट रहे हैं."
रिपोर्ट: एएफपी/महेश झा
संपादन: एम गोपालकृष्णन
 
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अदृश्यता पैदा करने के करीब पहुंचे अमेरिकी वैज्ञानिक

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अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक अदृश्य तकनीक की मदद लेते हुए एक जबरदस्त संचार सिस्टम बनाने में जुटे हैं. इसके 'टाइम क्लोक' यानी समय का आवरण कहा जा रहा है. सब कुछ आंखों के सामने होगा लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगेगी.

 
बनाई गई मशीन प्रकाश के बहाव को ऐसे परिवर्तित कर रही है कि इंसानी आंखें इस परिवर्तन को पकड़ ही नहीं पा रही है. विज्ञान मामलों की पत्रिका नेचर में इस बारे में एक रिपोर्ट छपी है. रिपोर्ट के मुताबिक प्रकाश की कुछ खास रंग की किरणों में बदलाव करने पर इंसान की आंख को बेवकूफ बनाया जा सकता है. वैज्ञानिकों को लगता है कि इस तकनीक की मदद से इंसान के सामने बिना किसी नजर में आए काफी कुछ किया जा सकेगा.
न्यूयॉर्क की कोरनेल यूनिवर्सिटी की मोटी फ्रीडमन कहती हैं, "हमारे नतीजे दिखाते हैं कि हम अदृश्यता पैदा करने वाला उपकरण बनाने के काफी करीब पहुंच रहे हैं." प्रयोग के तहत अलग अलग आवृत्ति वाली प्रकाश की किरणों को भिन्न भिन्न रफ्तार से आगे बढ़ाया जाता है. प्रयोग के लिए कई लैंसों का इस्तेमाल किया गया. सबसे पहले हरे रंग के प्रकाश को फाइबर ऑप्टिक केबल से गुजारा गया.
फिर प्रकाश अलग अलग लेंसों से टकराया. लेंसों से टकराते ही प्रकाश किरणें दो रंगों में बदल गई. प्रकाश नीले और हरे रंग में टूर गई. नीले रंग की किरण लाल रंग से ज्यादा तेज रफ्तार से आगे बढ़ी. प्रकाश की दो किरणें बनने के दौरान अदृश्यता की स्थिति पैदा हो गई. प्रयोग के अगले चरण में टूटे हुई किरणों को फिर से एक कर दिया गया और फिर से सामान्य प्रकाश बन गया और अदृश्यता गायब हो गई.
यह सब कुछ 50 पीकोसेकेंड के भीतर हुआ. यह एक सेकेंड के 10 लाखवें हिस्से का भी पांच करोड़वां हिस्सा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तकनीक का इस्तेमाल संचार में किया जा सकता है.  इस तकनीक के जरिए होने वाला संचार ऑप्टिकल सिग्नल तोड़ता है. किरणें टूटती हैं और अदृश्य हो जाती हैं. बाद में किरणों को फिर से एक किया जा सकता है और सब कुछ देखा जा सकता है. यानी डाटा को अदृश्य बनाकर भेजा जा सकता है और फिर एकत्रित किया जा सकता है.
रिपोर्ट: एएफपी/ओ सिंह
संपादन: एम गोपालकृष्णन
 
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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

जब पूल पार्टी में जवान छात्र-छात्राओं ने जमकर मचाया था हुड़दंग

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पिछले साल स्कूल स्टूडेंट्स द्वारा आयोजित एक पार्टी में जब हजारों की संख्या में युवक-युवतियां पहुंच गए तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। इस पूल पार्टी को कोलोरेडो स्टेट यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के लिए आयोजित किया गया था। फेसबुक पर प्रचार के कारण इसमें हजारों की संख्या में युवक-युवतियां पहुंच गए और उन्होंने वहां जमकर हुड़दंग मचाया।
यह पूल पार्टी (स्वीमिंग पूल पार्टी) फोर्ट कोलिंस अपार्टमेंट कॉंपलेक्स में पिछले साल अगस्त महीने में आयोजित की गई थी। फेसबुक पर इस पार्टी के पेज पर लगभग 3000 लोगों ने आने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया था। लेकिन पार्टी में लगभग 4000 लोग पहुंच गए। दोपहर बाद पुलिस को आस-पास के लोगों ने ख़बर द्वारा ख़बर मिली कि पार्टी में शराब परोसी जा रही है और स्थिति बिगड़ सकती है।
दोपहर 3 बजे पहुंच कर पुलिस ने पार्टी को रूकवाया और 4 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें से 2 यूनिवर्सिटी फुटबॉल टीम के खिलाड़ी भी हैं। पार्टी में हुड़दंग मचाने के कारण घायल 10 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। सभी गिरफ्तार युवकों को अधिक शराब पीने के मामले में गिरफ्तार किया गया।
पुलिस के अनुसार जब वे पार्टी में दबिश देने पहुंचे तो वहां का माहौल देखकर सनन रह गए। सभी लड़कियां टू-पीस बिकनी में थी और वहां जमकर हुड़दंग हो रहा था। वीडियो में देखिए किस तरह पूल पार्टी में युवक-युवतियां हुड़दंग मचा रहे थे। sabhar : bhaskar.com

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जानबूझ कर हजारों लोगों में फैलाया एड्स

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लंदन.अमेरिका में एक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति ने जानबूझ कर असुरक्षित यौन सम्बन्ध स्थापित कर हजारों लोगों में एड्स फैला दिया है।


51 साल के डेविड डीन स्मिथ ने खुद मिसिगन पुलिस स्टेशन जा कर कबूल किया कि वह पिछले कई सालों में 3000 आदमियों और औरतों के साथ सोया है। मामले की जांच कर रहे एक जासूस ने बताया "उसका कहना है कि उसने ऐसा जानबूझ कर किया ताकि इस बीमारी से और लोग मरे।"

हालांकि अबतक यह नहीं पता चल पाया है कि स्मिथ को अपने एचआईवी संक्रमित होने का पता कब चला। उसने दावा किया है कि जब वह कई साथियों के साथ असुरक्षित यौन सम्बन्ध बना रहा था,इसका उसे इल्म था।

डेली मेल अखबार के मुताबिक उसने दावा किया है कि पीड़ितों की संख्या हजारों में हो सकती है। फिलहाल उसे मुक़दमे के लिए अदालत लाया गया हैऔर उसपर अनभिज्ञ साथी के साथ 'एड्स सेक्सुअल पेनेट्रेशन' के दो काउण्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। sabhar : bhaskar.com
 
 

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सैफ की बेटी का यह खूबसूरत अंदाज देख दंग हैं सभी

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बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान ने पहली बार एक मैगज़ीन के कवर पेज पर छपकर सबको चौंका दिया है| सारा ने इस मैगज़ीन के कवर पेज पर अपनी माँ अमृता सिंह के साथ पोज किया है जो कि सैफ की पूर्व पत्नी हैं| क्रीम कलर के लहंगे में सजी सारा बेहद खूबसूरत नजर आ रही हैं|



तस्वीर काफी रॉयल और क्लासिक नजर आ रही है जिसमें अमृता बैठीं हैं और सारा उनके पीछे खड़ी हुई हैं| तस्वीर को देखकर आपको अंदाजा हो जाएगा कि सारा के नैन नक्श माँ पर गए हैं जबकि उनमें अपने पिता जैसा चार्म है| उनमें नेक्स्ट सुपर स्टार बनने के सारे गुण मौजूद नजर आ रहे हैं|सारा को देखकर लग रहा है कि उन्हें सजना संवरना काफी पसंद है|



हाल ही में अपनी बेटी के बारे में एक अख़बार को बताते हुए अमृता ने कहा, सारा अभी 16 साल की हैं, वह बहुत ही अच्छी साइन्स स्टूडेंट हैं और डॉक्टर बनना चाहती हैं| उनके लिए आनेवाला साल बहुत ही महत्वपूर्ण होगा|



अमृता ने यह भी बताया कि अमृता को डिजायनर कपड़े पहनना बहुत पसंद है और उनके पास इसका बहुत बड़ा कलेक्शन है| अब देखना ये है कि सारा भी अपने माँ बाप की तरह एक्टर बनने की राह पकड़ती हैं या फिर अपना डॉक्टर बनने का सपना पूरा करती हैं| sabhar : bhaskar.com
 

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जिंदगी जीना चाहती है सनी लेकिन पोर्न फिल्में पीछा नहीं छोड़ रही

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सनी लियोन लंबे समय से पोर्न फिल्मों में काम कर रही हैं। लेकिन अब वह इन फिल्मों से उब गई हैं। वह भारत बॉलीवुड में एंट्री के लिए आई थी।

वह बॉलीवुड की फिल्मों में काम करके अपनी छवि बदलना चाहती हैं। लेकिन उनका पिछला करियर उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। दरअसल , सनी बॉलीवुड की फिल्मों के लिए कपड़े नहीं उतारना चाहतीं , लेकिन पूजा भट्ट सनी के पॉर्न स्टार के स्टेटस को कैश करना चाहती हैं और यही वजह है कि उन्होंने इस फिल्म में उन्हें लेने का मन बनाया है।

ऐसे में वह चाहती हैं कि सनी फिल्म के फर्स्ट सीन में ही न्यूड पोज दें। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि सनी ने अभी फिल्म साइन नहीं की है और वह शर्तों से हट सकती हैं। अगर सनी न्यूड होने के लिए तैयार नहीं होती हैं , तो वह फिल्म से बाहर भी हो सकती हैं।
 sabhar : bhaskar.com

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चुकंदर के रस से बुजुर्ग भी हो जाते हैं जवान

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शरीर विज्ञानी कहते हैं कि इंसानी शरीर के लिए फलों और सब्जियों का भोजन ही सबसे बढिया होता है। इस बात को एक हालिया रिसर्च से और भी अधिक बल मिलता है। कुदरत ने हमारी धरती पर एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट और गुणकारी फल और शाक-सब्जियों को पैदा किया है। जमीन के अंदर पैदा होने वाला चुकंदर हमारी सेहत के लिये बेहद गुणकारी कंद है। चुकंदर के गुणों पर किए गए हालिया रिसर्च के नतीजे काफी उत्साहवर्धक हैं।

रिसर्च के नतीजों के मुताबिक चुकंदर का रस बुजुर्गो को ऊर्जावान बना सकता है। एक नए अध्ययन के मुताबिक यह रस बुजुर्गो के जीवन में फिर से जवानों के जैसी सक्रियता बढ़ा देता है।

अध्ययन के मुताबिक बुजुर्गो को चुकंदर का रस पीने के बाद हल्का-फुल्का व्यायाम करने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। उन्हें पैदल चलने के लिए जितना प्रयास करना पड़ता है, चुकंदर का रस पीने से उसमें 12 प्रतिशत तक की कमी आ जाती है।

"जर्नल ऑफ एप्लाइड फि जियोलॉजी" में ब्रिटेन के एग्जिटर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के हवाले से कहा गया है कि चुकंदर का रस पीने के बाद बुजुर्ग वह काम भी कर सकते हैं, जिनके लिए वैसे कोशिश भी नहीं करते हैं।
चुकंदर का रस रक्त वाहिनियों को फैला देता है और इससे शारीरिक सक्रियता के दौरान मांसपेशियों की ऑक्सीजन की आवश्यकता कम हो जाती है। लोगों की उम्र बढ़ने या उनमें ह्वदय परिसंचरण तंत्र को प्रभावित करने वाली स्थितियां निर्मित होने पर उनमें व्यायाम के दौरान अंदर ली जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा में नाटकीय रूप से कमी आ जाती है।
sabhar : www.patrika.com

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2050 की दुनिया

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आने वाली दुनिया कैसी होगी। सबकी अपनी कल्पनाएं और अंदाजे हैं। विज्ञान दुनिया को नए तरीके से देख रहा है। फिल्मी दुनिया की अपनी फंतासियां हैं। बात हो रही है 2050 की। आज की कल्पनाएं निश्चित तौर पर आने वाले वक्तके धरातल पर होंगी। संभव है दिमाग को कम्प्यूटर की फाइल के तौर पर सुरक्षित रखा जाए। यह भी मुमकिन है कि आदमी गायब होना सीख ले। 

यह है फ्यूचरोलॉजी
ऎसा नहीं है कि भविष्य दर्शन केवल फिल्मकारों की कल्पना तक सीमित है। वैज्ञानिक भी इसमें खासी रूचि ले रहे हैं। तथ्यों और पूर्वानुमानों के सामंजस्य को विज्ञान की कसौटी पर परख कर भविष्य की कल्पना एक नए विज्ञान की राह खोल रही है। यह विज्ञान है फ्यूचरोलॉजी यानी भविष्य विज्ञान। क्या भविष्य में चांद पर बस्ती बसेगी। क्या हमारा परिचय धरती से परे किसी दूसरी दुनिया के प्राणियों से होगा। क्या इंसान मौत पर विजय पाने में कामयाब हो जाएगा। नामुमकिन सी लगने वाली ऎसी कल्पनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन भी फ्यूचरोलॉजी के तहत किया जा रहा है। जिस तरह से मौसम-विज्ञानी भविष्य में मौसम का, अर्थशास्त्री भविष्य की विकास दर और इतिहासकार अतीत की घटनाओं का तार्किक आकलन पेश करते हैं, उसी तरह से भविष्यविद् भविष्य में होने वाले बदलाव की तस्वीर उकेरते हैं।

भविष्यविदों की साल 2050 पर खास नजर है। कारण यह है कि 2050 ऎसा वक्तहै, जिसे वर्तमान पीढ़ी के अधिकतर लोग देख सकेंगे और तब तक तकनीकी रूप से उन्नत 21वीं सदी का आधा वक्तगुजर चुका होगा। अमरीका और ब्रिटेन के कुछ विश्वविद्यालयों में फ्यूचरोलॉजी सेंटर स्थपित हो चुके हैं। 2050 की दुनिया की तस्वीर का अनुमान लगाने के प्रयास चल रहे हैं। भविष्यविद् हर संभव तरीके से भविष्य का सटीक आकलन करने में जुटे हैं। अपने अनुमानों को दुनिया के सामने रख रहे हैं।

दिमाग होगा डाउनलोड
वैज्ञानिकों की मानें तो 2050 तक इंसान मौत को चुनौती देने में कामयाब हो सकता है। शारीरिक रूप से भले ही यह संभव न हो सके। लेकिन, दिमागी रूप से ऎसा मुमकिन है। ऎसी तकनीक विकसित हो सकती है, जिसके जरिए इंसान के दिमाग को कम्प्यूटर से जोड़कर उसे हार्ड डिस्क में सेव किया जा सकना संभव होगा। इसके बाद दिमाग का डाटा कम्प्यूटर में एक फाइल के रूप में होगा और उसे कभी भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। अभी तक इंसान के संवेदी तंत्र को कम्प्यूटर से जोड़कर एनिमेशन तैयार करने के प्रयोग हो चुके हैं। ऎसे में इस सोच को कपोल कल्पना मानकर ठुकराया नहीं जा सकता। इसके अलावा 2050 में सुपर कम्प्यूटर आज के मुकाबले में एक हजार गुना ज्यादा शक्तिशाली होंगे। साथ ही इनके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के स्तर में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। 

नए लुक में टेलीविजन
चार दशक बाद वर्तमान टेलीविजन पूरी तरह से गायब हो जाएंगे। इनकी जगह लेगा इंटरेक्टिव होलोग्राम टीवी, जिस पर दर्शक मनचाहे समय पर कोई भी कार्यक्रम अपनी सुविधा से देख सकेंगे। दर्शक त्रिआयामी तस्वीरों के साथ सुगंध का मजा भी ले सकेंगे। वर्तमान प्रसारण व्यवस्था बदलेगी और कार्यक्रम के प्रसारण के बजाय दर्शक को सूचना दी जाएगी, अमुक कार्यक्रम प्रसारण के लिए उपलब्ध है। दर्शक अपनी सुविधा से चैनल डायरेक्ट्री में जाकर कार्यक्रम देख सकेंगे। फिलहाल इंटरनेट पर कार्यक्र्रम इसी तरह उपलब्ध रहते हैं और दर्शक जब चाहे उन्हें देख सकता है। कुछ खास सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन के साथ खुशबू बिखेरने के प्रयोग हो चुके हैं। इनके अलावा आईपीटीवी भी हर घर में होंगे, जो टेलीफोन, इंटरनेट और केबल टेलीविजन जैसी सभी जरूरतों को वायरलैस तरीके से पूरा करेंगे। तो टेलीविजन को अपना सबसे प्यारा दोस्त बनाने के लिए तैयार रहिए। 

एलियंस हमारे दोस्त
फिलहाल दूसरे ग्रह पर जीवन के संकेत ढूंढने में लगे वैज्ञानिक इस कल्पना को नकार नहीं सकते कि किसी अन्य ग्रह पर धरती से विकसित सभ्यता का अस्तित्व हो सकता है। कई बार वैज्ञानिकों की ओर से उड़न तश्तरियां देखे जाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन, अभी तक प्रामाणिक रूप से किसी और ग्रह पर जीवन की पुष्टि नहीं हुई है। भविष्यवक्ताओं के मुताबिक साल 2050 तक दूसरे किसी ग्रह पर जीवन का पता लग सकता है और उस ग्रह के प्राणियों यानी एलियंस के साथ इंसान का संपर्क भी स्थापित हो सकता है। फिलहाल दुनिया में कई एजेंसियां कथित यूएफओ संकेतों के विश्लेषण में जुटी हैं। इसी तरह की सेटी नामक एक परियोजना में हजारों कम्प्यूटरों की मदद से संकेतों का विश्लेषण किया जा रहा है। 

उड़न कार है ना
आप मानकर चलिए कि 2050 तक निजी उड़न कारें बहुतायत में होंगी और आवागमन के लिए वायुमार्ग का सबसे ज्यादा प्रयोग होगा। उड़न कारों के आंशिक प्रयोग फिलहाल सफल रहे हैं। उम्मीद है कि अगले दशक तक उड़न कारों का प्रयोग शुरू हो जाएगा। ये कारें-टू-सीटर और फोर-सीटर होंगी। उन्हें उतारने के लिए किसी खास हवाई पट्टी की जरूरत नहीं होगी। सड़कों पर दुर्घटना की आशंका नगण्य हो जाएगी। क्योंकि, सभी वाहन कम्प्यूटर संचालित होंगे। उनके सेंसर दूसरे वाहन की मौजूदगी या किसी अन्य बाधा को समय रहते भांप लेंगे और वाहन को रोक देंगे। आवागमन के दौरान रफ्तार में इजाफा होगा। आज मैंगलेव टे्रन 500 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ चुकी है। उम्मीद है कि 2050 तक यह रफ्तार 1000 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। 

भूल जाएंगे पेट्रोल
हैरत मत कीजिए हो सकता है साल 2050 तक वर्तमान पेट्रोलियम ईधन का प्रयोग बंद हो जाए और इसका स्थान हाइड्रोजन चलित कार ले ले। जिसका प्रयोग सफल रहा है और इसे भविष्य के ईधन के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा कुछ अन्य रासायनिक तत्वों को भी ईधन के रूप में विकसित करने के प्रयास चल रहे हैं। असीमित ईधन के रूप में वायु एवं सौर ऊर्जा को भी परखा जा रहा है। कुछ भी हो, चार दशक बाद का समय पर्यावरण प्रेमियों के लिए जश्न का समय होगा। क्योंकि, उन्हें पेट्रोलियम गुबार के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का डर नहीं होगा। साथ ही आम जनता को भी सस्ता और स्वच्छ ईधन मुहैया हो सकेगा।

आबादी में इजाफा
सहज जीवनशैली और चिकित्सा के निरंतर विकास के कारण मृत्युदर कम होगी और जनसंख्या बढ़ेगी। औसत उम्र 65 साल से 80 तक पहुंच जाएगी। सबसे ज्यादा संकट जापान जैसे देशों के लिए होगा, जहां वर्तमान औसत उम्र दुनिया में सर्वाधिक है। तकनीकी विकास के चलते चिकित्सा सेवाएं बेहतर होंगी और आज की कई बीमारियों का नामों-निशान तक नहीं रहेगा। सभी बीमारियों की रोकथाम के लिए एक ही टीका पर्याप्त होगा। कृत्रिम खून का प्रयोग होने लगेगा और कोई भी मरीज खून की कमी के कारण जान नहीं गंवाएगा। एड्स जैसे असाध्य रोगों का इलाज संभव हो सकता है। लेकिन, नई तरह की बीमारियों के प्रकट होने की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रोबोट्स का बोलबाला
माना जा रहा है कि घरों में नौकर 2050 तक गायब हो चुके होंगे। उनकी जगह लेंगे रोबोट्स। फिलहाल होंडा कंपनी का असीमो नामक रोबोट समझदारी के साथ कई काम निपटाने में माहिर है। घर साफ करने से लेकर कपड़े सुखाने तक का काम यह रोबोट कर सकता है। भविष्य में रोबोट तकनीक में काफी सुधार होगा और ये वहन करने लायक कीमत पर जनता को मुहैया होंगे। मशीनों को कुछ स्तर तक संवेदनशील बनाने के प्रयास भी चल रहे हैं। भावनात्मक दोस्तनुमा रोबोट बनाने में कामयाबी मिल चुकी है। चार दशक बाद अधिकतर दुकानें मशीनों से ही संचालित होंगी। बिल्कुल उसी तरह, जैसा आज चाय या कॉफी वेंडिंग मशीन का संचालन होता है। मानवीय श्रम लगभग गायब हो चुका होगा। वर्तमान श्रमिक रोबोट संचालन के रूप में नजर आएंगे। फिर तो इंसानी ओलंपिक के साथ ही रोबोट ओलंपिक का भी आयोजन होगा।

हाइटेक आशियाने
मकानों की ऊंचाई 2050 तक लगभग बढ़ेगी। लेकिन, भविष्य में बनने वाली इमारतें आज के मुकाबले सुरक्षित होंगी। बड़े शहरों में सौ-मंजिला इमारतें आम होंगी। ऊंची इमारतों का संचालन कम्प्यूटराइज्ड होगा। मकान में फाइबर, स्टील और लकड़ी का इस्तेमाल आज के मुकाबले में ज्यादा होगा। भूकंप संभावित क्षेत्र में निर्माण में विशेष्ाज्ञ एहतियात बरतने का काम शुरू हो चुका है। चार दशक में इमारतें सुरक्षा मानकों पर पूरी तरह खरी उतरेंगी। हरियाली और सिकुड़ेगी और उनकी जगह कंकरीट के जंगल लेंगे। आज की कुछ दुर्लभ वन्य प्रजातियां 2050 में केवल तस्वीरों तक सिमट सकती हैं। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवासीय भूमि में बढ़ोतरी होगी।

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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

ऑलिव ऑयल से तीन हफ्ते में दूर हो जाएंगी झुर्रिया

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जापान के स्‍वास्‍थ्‍य विज्ञानियों का मानना है कि ऑलिव ऑयल के अंदर मौजूद फ्लेवसेनॉयड्स स्‍कवेलीन और पोरीफेनोल्‍स एंटीऑक्‍सीडेंट्स हैं, जो फ्री रैडिकल्‍स से सेल्‍स को डैमेज होने से बचाते हैं। अगर इसे भोजन में शामिल किया जाए तो इससे ब्‍लडप्रेशर को नियंत्रित रखा जा सकता है। इसका इस्‍तेमाल उबटन, फेसमास्‍क आदि के रुप में भी किया जाए  यह त्‍वचा को झुर्रियों से बचाता है।   

 हफ्ते में तीन बार
  हफ्ते में तीन बार नींबू में रस में ऑलिव ऑयल मिला कर चेहरे की मालिश करें, इससे न सिर्फ झुर्रियां भागेगीं बल्कि चेहरे की रंगत में भी निखार आएगा। साथ ही बालों में लगाने से इनकी अच्‍छी कंडीशनिंग भी हो जाती है। उलझे बालों की समस्‍या भी सुलझेगी।

दूर होगी डैंड्रफ की समस्‍या
थोडा सा ऑलिव ऑयल अपने होथों में लें और उन्‍हें रुखे और बेजान बालों पर लगाएं, इससे आपके बाल सिल्‍की हो जाएंगे। और अगर आपको डैंड्रफ की समस्‍या है तो वही भी कम हो जाएगी।
चेहरा निखर जाएगा
 चेहरे को सादे पानी से अच्‍छी तरह से धो लें। अब ऑलिव ऑयल से मसाज करें। इसके बाद आधा चम्‍मच चीनी लेकर चेहरे पर रगड़े। अंत में गुनगुने पानी में एक मुलायम कपड़ा भिगोकर चेहरे को भिगो कर चेहरे को पोंछ लें। कुछ दिनों तक ऐसा कर के आप महसूस करेगीं कि आपका चेहरा निखर उठा है।  
कोमल होंठ
रुखे, बेजान, फटे होठों पर ऑलिव ऑयल कि हल्‍की मालिश सुबह शाम करें इससे आपके होंठ कोमल हो जाएगें।
खूबसूरत नाखून
करीब आधे घंटे के लिए ऑलिव ऑयल में नाखूनों को डुबोकर रखें। इससे नाखून और क्‍यूटिकल्‍स नरम और लचीले हो जाएगें। यह किसी भी क्रीम से बेहतर काम करेगा। आप चाहें तो पैरों को साफ करके उसपर ऑलिव ऑयल लगाएं और सूती मोजे पहन कर सो जाएं। पेडीक्‍योर की जरूरत नहीं पड़ेगी।
 
 
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यहां पैदा होते ही कुचल कर मार दिए जाते थे कैदियों के बच्चे

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न्यूज डेस्क.नोर्थ कोरिया के 'प्यारे नेता' किम जोंग इल के निधन ने एकाएक पूरी दुनिया का ध्यान इस द्वीप की ओर आकर्षित कर दिया है। इस देश के प्रमुख नेता की मृत्यु ने एक बार फिर नोर्थ कोरिया के उस कड़वे सच की यादें ताजा कर दी हैं।

उत्तर कोरिया अपने राजनीतिक कैदियों को अमानवीय प्रताड़ना दिए जाने की बात पर बदनाम हुआ था। 21वीं सदी की शुरुआत में नोर्थ कोरिया का यह कड़वा सच उजागर हुआ था।

नोर्थ कोरिया के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित हेंगयोंग शहर में एक खुफिया कैंप चलाया जाता था, जहां राजनीतिक कैदियों को रखा जाता था। कैंप 22 नाम से मशहूर यह जेल चीन और रूस की सीमा करीब स्थित थी।

इस खतरनाक जेल से छूटे कैदियों के बयानों ने नोर्थ कोरिया में हो रहे अमानवीय आचरण का सच उजागर किया था। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने अपनी एक रिपोर्ट में उत्तर कोरिया के खुफिया कैंप 22 का खुलासा किया था।

अखबार ने दावा किया था कि हर साल इस कैंप में हजारों लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। इस कैंप में सुरक्षाकर्मी कैदियों के बच्चों की पैदा होते ही पैरों से कुचलकर मार डालते हैं।

गार्जियन के मुताबिक इन कैंपों में विद्रोहियों को गैस चैंबरों में रखकर प्रताड़ना दी जाती थी। उनके ऊपर भीषण रासायनिक प्रयोग किए जाते थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उत्तर कोरियाई गार्ड कैदियों के पूरे परिवार को गैस चैंबर में डाल देते थे। अंदर लोग तड़पकर मरते रहते थे और बाहर खड़े वैज्ञानिक उन पर नोट्स लेते थे।

क्वोन ह्यूक नाम के एक पूर्व नोर्थ कोरियाई दूतावास के अधिकारी ने कैंप 22 में हुए अत्याचारों का खुलासा किया था। बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री में ह्यूक ने रेखाचित्रों के जरिए उन जेलों का विवरण दिया था।

ह्यूक ने कहा, "मैंने एक पूरे परिवार को गैस चैंबर के अंदर घुटने से मरते हुए देखा था। परिवार में माता-पिता, एक बेटा और एक बेटी थे। मां-बाप लगातार उल्टियां कर रहे थे और मर रहे थे। लेकिन इसी दौरान वो अपने बच्चों की बचाने का प्रयास भी कर रहे थे। लेकिन अंततः कोई जिंदा नहीं बचा।"

ह्यूक ने गैस चैंबर को दर्शाते कई रेखाचित्र भी बनाकर दिखाए थे। उसने कहा, "गैस चैंबरों को एयरटाइट सील कर दिया गया था। वो 3.5 मीटर चौड़े, 3 मीटर लंबे और 2.2 मीटर ऊंचे थे। उसके अंदर कैदियों को बंद कर दिया जाता था और जहरीली गैस छोड़ी जाती थी। लोग अंदर मरते रहते थे और वैज्ञानिक बाहर खड़े होकर उनका अध्ययन करते थे।"

ह्यूक ने बताया कि उस समय कैदियों के प्रति वो व्यवहार उन्हें सही लगता था। ह्यूक ने कहा, "अगर मैं यह कहूं कि बच्चों को ऐसी दर्दनाक मौत मरता देख मुझे उन पर दया आती थी, तो यह गलत होगा। उस समय मुझे लगता था कि वो सिर्फ हमारे दुश्मन हैं जिनके कारण हमारा देश तरक्की नहीं कर पा रहा है।"

खून की उल्टियां करते हुए मर गईं वो महिलाएं

नोर्थ कोरिया के कैंप 22 में सात साल तक कैदी रहे ओक ली ने भी एक चौंकाने वाला खुलासा किया था। ली के मुताबिक एक दिन सुरक्षाकर्मियों ने उससे 50 स्वस्थ महिला कैदियों का चयन करने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने ली को कुछ गीली पत्तागोभी दीं। गार्डों ने ली को उन्हें चयनित 50 महिलाओं को देने के लिए कहा। पत्तागोभी खाते ही वो लड़कियां खून की उल्टियां करने लगीं। 20 मिनट बाद उनमें से कोई जिंदा नहीं बचा था। sabhar :bhaskar.com

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