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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

भविष्य की पीढ़ियां जिस दुनिया में रहेंगी वे हर लिहाज़ से ज़्यादा कनेक्टेड होंगी

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भविष्य की पीढ़ियां जिस दुनिया में रहेंगी वे हर लिहाज़ से ज़्यादा कनेक्टेड (जुड़ी हुई) होंगी. लेखक टेड विलियम्स पूछते हैं कि क्या ये एक जुड़ी हुई दुनिया यानी कनेक्टेड वर्ल्ड कैसे हमारे समाज और हमें बदल देगी.
"तर्कशील व्यक्ति दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल लेता है जबकि अविवेकी व्यक्ति दुनिया को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करता है. इसलिए जितनी भी तरक्की है वह अविवेकी मनुष्य पर निर्भर है." जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

भले ही हम उन्हें तब महसूस नहीं कर पाते हैं जब वे घटित हो रहे होते हैं.तकनीक के हर बड़े क़दम ने मानव समाज को व्यापक रूप में बदला है. इसलिए ही हम जानते हैं कि वे बड़े तकनीकी बदलाव थे.

निजी विचार और समूह

जेबीएस हेल्डेन के ब्रह्मांड के बारे में दिए गए प्रसिद्ध वक्तव्य में कहा जाए तो, 'भविष्य आपकी कल्पना से अलग नहीं होगा बल्कि जितनी आप कल्पना कर सकते हैं उससे बहुत अलग होगा.'
हम सामाजिक प्राणी हैं लेकिन भिन्न होने के ख़तरे तब से कम हुए हैं जब से व्यक्तिवाद हमारे समाज और स्वयं हम में बड़ी ताक़त बनता चला गया है.
फ़्यूचर सिटी
भविष्य की दुनिया ज़्यादा कनेक्टेड होगी
नवीन तकनीक एक बड़ा कारण है. दो शक्तिशाली बल अब तेज़ी से समाज और व्यक्ति के बीच के समीकरण बदल रहे हैं.
व्यक्तिवाद का केंद्रीकरण और एक बंटे हुए समाज से अस्थिर और समस्तरीय समाज के प्रति निष्ठा का हस्तांतरण.
अपने शानदार उपन्यास 'केट्स क्रेडल' में कर्न वोनॉट ने एक ऐसे धर्म की खोज की जो मानवीय रिश्तों को 'कारासेज़' या फ़िर 'ग्रेनफॉलूंस' में परिभाषित करता है.
कारासेज़ का मतलब है लोगों के बीच में सच्चा संपर्क जो स्वतः स्थापित होता है और ग्रेनफॉलूंस ऐसे रिश्ते हैं जो अधिकतर असत्य होते हैं यानि जन्म, रंग, स्थान आदि के आधार पर बनते हैं.
बहुत से धर्म और राष्ट्र, जैसे कि सच्चे समस्तरीय सामाजिक समूह, साझा विचारों के रूप में शुरु हुए लेकिन जैसे-जैसे ये संस्थाएं बढ़ी और बदली लोगों के बीच की सहमतियाँ धूमिल होती चली गईं.
अमरीका में उदार ईसाई, कट्टर ईसाइयों के मुकाबले उदार नास्तिकों से ज़्यादा मिलते-जुलते हैं.
तो फ़िर अमरीकी ईसाई कौन हैं? लेकिन ब्लूग्रास का एक प्रशंसक हमेसा ब्लूग्रास का ही संगीत पसंद करेगा भले ही वो टैनेसी में रहता है या ट्यूनीसिया में.
जो विचार आधिकारिक सीमाओं में क़ैद नहीं होते वे ही अपने अनुयायियों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं. जबकि राष्ट्र और धर्म बहुत ही कम लचीले होते हैं.
लेकिन यदि हम अपनी निष्ठाओं को अधिक व्यक्तिकत रुचियों जैसे कि पर्यावरण की राजनीति, बंदूकों पर मालिकाना हक़, पुराने फर्नीचर को ख़रीदना या फिर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नज़र रखना आदि की ओर करेंगे तो हम देशीय या अन्य सीमाओं में नया राजनीतिक गठबंधन बना लेंगे.

स्वास्थ्य क्रांति

लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक
तकनीक की दुनिया में हो रहे तीव्र बदलाव हमें सिर्फ़ जानकारियाँ साझा करने से और भी बहुत कुछ ज़्यादा करने का मौका देते हैं.
ज़ल्द ही हम लोगों के विचार, सोच और उनकी आवाज़ को सुन पाएंगे. बिना बोले संवाद की तकनीक (वर्चुल टच) में होने वाले सुधारों की मदद में से हम चीजों की छु्अन का अहसास भी साझा कर पाएंगे.
अगर आपकी पर्वतारोहण में रुचि है तो इस तकनीक के ज़रिए माउंट एवरेस्ट पर चढ़ रहे किसी शेरपा के बूट में आप अपना पाँवों को महसूस कर पाएंगे और जान पाएंगे कि उसे कैसा लग रहा है.
आप स्काई डाइवर के साथ छलाँग लगा सकेंगे और अमेजन नदी के किनारे बसे लोगों से ऐसे बात कर पाएँगे जैसे आप वहीं हो.
यही नहीं किसी सड़क पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में आप हज़ारों किलोमीटर दूर होते हुए भी शामिल हो पाएंगे.
लेकिन नज़रिए में बदलाव सिर्फ़ यहीं नहीं रुकेगा. तकनीक की दुनिया में हो रहे बदलाव हमारी स्वयं की भौतिकी में भी बदलावों के संकेत दे रहे हैं.
स्मार्टफ़ोन सिर्फ़ एक तकनीकी पड़ाव हैं, हालाँकि वे इस सदी में ताज़ा रहेंगे और दुनिया के कम विकसित इलाक़ों में उनके कई अप्रत्याशित इस्तेमाल भी होंगे, लेकिन विकसित देशों में इक्कीसवीं सदी के मध्य तक पहुँचते-पहुँचते हम अपने कंप्यूटर डिवाइस को अपने साथ रखने के कई व्यक्तिगत तरीकों की ओर जाने लगेंगे.
भले ही हम तब तक सीधे स्थापित होने वाले 'साइबरपंक' हासिल न कर पाएं, स्मार्ट गॉगल या शरीर में फिट होने वाले बेहद छोटे आकार के इनपुट-आउटपुट डिवाइस फोन का स्थान ले लेंगे.
लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं, न सिर्फ़ आपका पूरा सहकर्मी समूह आपगे दिमाग़ में होगा बल्कि आपको अपनी सेहत के प्रति भी अतिचिंतित नहीं होना पड़ेगा.
हृद्यगति, अंगों की सक्रियता, ब्लड शुगर, यहाँ तक की दिमाग़ी हालत की भी जानकारी आपको पल-पल मिलती रहेगी.
हीट सिग्नेचर (शरीर या गति से निकलने वाली गर्मी) से हमें पता चल जाएगा कि क्या हम किसी तेज़ रफ़्तार से आती कार के रास्ते में तो नहीं है या आगे कोई लुटेरा हमारा इंतज़ार तो नहीं कर रहा है.

बदलेंगे विचार

लोग भविष्य कनेक्टेड, संचार, तकनीक
किराने की दुकान से ख़रीदारी करते वक़्त हम हर सामान को स्कैन कर उसके बारे में अतिरिक्त जानकारी और बाकी लोगों की राय तुरंत हासिल कर सकेंगे.
अगर आपको किसी ख़ास पदार्थ से एलर्जी है या फ़िर आपके भोजन की कुछ ख़ास ज़रूरतें हैं तो किसी भी पदार्थ को चखने से पहले ही आपको उसके बारे में समस्त जानकारी मिल सकेगी और आप तय कर सकेंगे कि आपको यह सामान ख़रीदना है या नहीं.
महत्वपूर्ण जानकारियों को किसी भी वक्त हासिल करने की इस क्षमता के रास्ते में क़ानून और राजनीति भी आएंगे.
यदि ऐसी सेवाएं उपलब्ध होंगी तो ज़्यादातर लोग इन्हें हासिल करना चाहेंगे, भले ही वे इनकी क़ीमत चुकाने में सक्षम हो या न हों.
ख़ासकर उन सेवाओं की माँग बढ़ेगी जो जीवन को बढ़ाने में मदद करेंगी.
इन जानकारियों को सभी लोगों को उपलब्ध करवाने का दवाब ऐसा ही होगा जैसा किसी अन्य स्वास्थ्य संबंधी सेवा पर होता है.
सिर्फ़ अमीर लोगों के पास ही हृद्यघात के वक़्त जान बचाने वाले शरीर में फिट गए मॉनिटर या फिब्रिलेटर क्यों हों?
जब आपके तमाम मित्र आपके दिमाग़ के भीतर या फिर हर समय आपसे जुड़े हुए हो और आप व्लादिवोस्क में बैठे किसी व्यक्ति से उस खेल के बारे में चर्चा कर रहे हो जिसे आप दोनों खेल रहे हैं, या फिर आप अपने जैसी सोच रखने वाले दमिश्क में बैठे किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो निश्चित रूप से आपके इस बारे में विचार बदलेंगे कि 'हम' क्या हैं और 'वे' क्या हैं.
राजनीतिक एवं अन्य विभाजन खत्म नहीं होंगे, लेकिन वे हमें अलग लगने लगेंगें.

नए तरीके खोजने होंगे

क्या अधिक निजी स्वतंत्रता और निजी निवेश की इस दुनिया का कोई स्याह पहलू भी है?
जाहिर तौर पर हैं. जैसे-जैसे हम लगातार अपडेट होती जानकारियों से घिरे हुए स्वयं के निर्मित विश्व में अधिक समय बिताएँगे और अपने और अपने जैसी सोच रखने वाले लोगों के बारे में बेहद सूक्ष्म जानकारियाँ रखेंगे, हम एक अलग किस्म के मानव समाज में परिवर्तित होते जाएंगे.
कुछ लोगों का कहना है कि डरने के लिए सिर्फ अधिकाधिक अत्यधिक आत्म भागीदारी ही नहीं बल्कि अन्य कारण भी हैं.
सामाजिक आलोचकों को लगता है कि हम इंटरनेट युग से पहले भी एक जैसी सोच वाले लोगों के समूहों की ओर अग्रसर हो रहे थे.
साइबर जगत में ध्रवीकरण पर हुए ताज़ा शोध बताते हैं कि जन संपर्क के इस दौर में हालात और भी बदतर हुए हैं, यानि व्यक्तिगत की तुलना में एक जैसी सोच वाले समूहों में हम ज़्यादा कट्टर हो जाते हैं.
व्यक्तिगत होने के मुकाबले जब हम समूह में होते हैं तब अलग दृष्टिकोण के प्रति तिरस्कार की भावना भी रखते हैं.
आने वाली सदी में हमारी चुनौती इन अपनी सोच के दायरे में सीमित रहने से खुद को रोकने की भी होगी.

हमें सिर्फ़ अपने बारे में ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों के बारे में भी सोचना होगा. वास्तव में, जब पुराने तरीके विलुप्त हो जाएंगे तब हम मनुष्यों को पड़ोसी होने के नए तरीके खोजने होंगे.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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