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सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

कृष्णन आज देश इन्हें हीरो कहता है

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जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...

नई दिल्ली. क्या कोई ऐश्वर्य भरी जिंदगी छोड़ सड़क की धूल छानने की चाहत रखना चाहेगा? क्या कोई अपने सपनों को रौंदना चाहेगा? अधिकांश जवाब 'ना' ही मिलेगा। मगर, ऐसा हुआ है। नारायण कृष्णन। जी हां, आज के समय का बड़ा चेहरा। ये वही शख्सियत हैं, जिन्होंने ऐश्वर्य भरी जिंदगी छोड़कर कांटों भरी राह को गले लगाया है।
 
2002 में हुए एक वाकये ने मदुरई (तमिलनाडु) निवासी कृष्णन की जिंदगी हमेशा के लिए बदल कर रख दी। आज देश इन्हें हीरो कहता है
 
2003 में कृष्णन ने 'अक्षय' नाम से मुनाफा न कमाने वाले ट्रस्ट की शुरुआत की। अब उनके जीवन का एक ही मकसद है, गरीब भूखे पेट न सोए। कृष्णन के मेहमानों की लिस्ट में गरीब, बेसहारा और बेघर लोग शामिल हैं। 34 वर्षीय कृष्णन अब तक मदुरई के एक करोड़ से भी ज्यादा लोगों को सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना खिला चुके हैं। वह नि:स्वार्थ भाव से जनसेवा में लगे हुए हैं। पूरे देश को उनपर गर्व है। लेकिन उनकी यही जनसेवा अब मुद्दा बन चुकी है। मुद्दा, गरीबी-अमीरी के बीच के खाई का। मुद्दा, देश में लगातार बढ़ रहे रईसों और उसी अनुपात में बढ़ती गरीबी का। क्योंकि भारत को अरबपतियों का देश भी कहा जाता है। बानगी के तौर पर दुनिया का सबसे महंगा घर भी भारत में ही है।  

जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...

ऐसे बदल गई कृष्णन की जिंदगी
 
कृष्णन एक बेहतरीन शेफ हैं। वह इसके लिए अवार्ड तक जीत चुके हैं। उन्हें स्विट्जरलैंड के फाइव स्टार होटल ने शानदार नौकरी ऑफर की। लेकिन यूरोप जाने से पहले ही एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल कर रख दी। कृष्णन बताते हैं 'मैंने सड़क किनारे एक बूढ़े इंसान को कचरे में खाना ढूंढते देखा। वह भूख से तड़प रहा था। उस इंसान को इतनी जोरों की भूख लगी थी कि उसने कचरा तक खा लिया। यह देख मुझे बेहद तकलीफ हुई। मैं फौरन पास के होटल गया और वहां से इडली खरीद कर लाया। फिर उन्हें खाने को दिया। मैंने आज तक इतनी तेजी से किसी को खाते नहीं देखा। खाते समय उसकी आंखों से आंसू झरने लगे। मगर वह खुशी के आंसू थे। यही मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ था।'
 जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...
कृष्णन बेसहारा और निशक्तों के लिये आशियाना भी बनवा रहे हैं ताकि इन लोगों को सड़कों पर न भटकना पड़े। आइए एक नजर डालते हैं उनके रोजमर्रा के खर्चों पर...
 
- 400 लोगों का भोजन (खुद के हाथों        बना शाकाहारी भोजन खिलाते हैं)
- दिन में तीन बार
- अगर भूखा व्यक्ति कमजोर है तो अपने हाथों से उसे खाना खिलाते हैं
- औसतन 200 किमी रोज का आनेजाने का खर्च 
(एक बार के भोजन का औसत व्यय 5000 रुपये, मतलब प्रतिदिन 15,000 रुपये)

जब कृष्णन है तो कोई भूखे पेट क्यों सोए,कलियुग का 'कृष्ण'...


देश में केवल 27 करोड़ गरीब: सरकार
 
देश में गरीबी और अमीरी के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है। मगर सरकार का ध्यान सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी पर है। हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा जारी गरीबी के आंकड़ों पर सियासत गरमा गई थी। खूब चला आरोप-प्रत्यारोप का दौर। लेकिन कैसे घटेगी गरीबी इस पर किसी ने चर्चा नहीं की। सरकार ने गरीबों का मखौल उड़ाने के अलावा और कुछ नहीं किया है।गरीबी के आंकड़ों पर नजर डालें तो केंद्र सरकार का कहना है कि देश में गरीबों की संख्या 2004-05 के 40.74 करोड़ लोगों से घटकर 2011-12 में 27 करोड़ ही रह गई है। मतलब, देश में केवल 27 करोड़ लोग ही गरीब हैं। अगर ऐसा है तो सड़कों पर जो बेसहारा और निशक्तजन भटकने को मजबूर हैं उनकी कौन सुध लेगा। ये बड़ा सवाल है। खैर गरीबी को मापने के लिए सरकार के पास कौन सा पैमाना है हम उसकी बात नहीं करेंगे। गरीबी को लेकर जो ताजा आंकड़ा सामने है, वो एनएसएसओ की ओर से कराए गए सर्वे के 68वें दौर में सामने आया है। 

sabhar : bhaskar.com



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