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गुरुवार, 19 जून 2014

सौर ऊर्जा को सूर्य नमस्कार

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कोयले की कमी ने भारत में कई कंपनियों की हालत खराब की. लेकिन जब कोई हल नहीं निकला तो कुछ कंपनियों ने सौर ऊर्जा का रुख किया. इस तरह देश में दुर्घटनावश ही सही, लेकिन चुपचाप ऊर्जा क्रांति की शुरुआत हो गई.



लगातार छह साल तक भारत के कोयला उत्पादक मांग को पूरा नहीं कर पाए. इसकी वजह से बिजली बनाने वाले संयंत्रों की हालत खराब हो गई. शुरुआत में उन्होंने कुछ महीनों तक विदेशों से कोयला खरीदा लेकिन दाम ज्यादा होने की वजह से देर सबेर ये खरीद बंद हो गई. ऊर्जा संकट के घने बादलों के बीच कुछ कंपनियों ने सौर ऊर्जा में निवेश करना शुरू किया. देखा देखी दूसरों ने भी की और धीरे धीरे भारत में बाबा आदम के जमाने का ऊर्जा ढांचा बदलने लगा.
तीन साल पहले भारत की सौर ऊर्जा क्षमता लगभग शून्य थी. लेकिन आज यह क्षमता 2.2 गीगावॉट है. इतनी बिजली से 20 लाख घरों की जरूरत पूरी की जा सकती है. इस साल क्षमता को और दो गीगावॉट बढ़ाने की योजना है. भारत ने 2017 तक 15 गीगावॉट वैकल्पिक ऊर्जा बनाने का लक्ष्य तय किया है. हिंदुस्तान पावर प्रोजेक्ट्स के चैयरमैन रातुल पुरी कहते हैं, "मैंने कोयला प्लांट विकसित करने बंद कर दिए हैं. यहां पर्याप्त कोयला ही नहीं है और मैं बाहर के कोयले पर निर्भर नहीं रहने वाला हूं. ये बहुत जोखिम भरा है."
हिंदुस्तान पावर सौर ऊर्जा से बिजली बनाने वाले दो संयंत्र लगा चुकी है. उत्पादन इसी साल शुरू हो जाएगा. कंपनी भविष्य में भी सौर ऊर्जा में तीन अरब डॉलर का निवेश करने जा रही है. 2017 तक उत्पादन 350 मेगावॉट से बढ़ाकर एक गीगावॉट करने का लक्ष्य है.
कोयले में छुपी कालिख
भारत के कोयला उत्पादन में सरकारी कंपनी कोल इंडिया का एकाधिकार है. बीते सालों में कोयला घोटाले जैसे बड़े मामले सामने आए हैं. बिजली कंपनियों को लगता है कि कोल इंडिया के तौर तरीकों में बदलाव की उम्मीद करने के बजाए सौर ऊर्जा के रास्ते पर बढ़ना ज्यादा आसान विकल्प है. कोल इंडिया काफी कोयला निकाल चुकी है. बाकी का कोयला शहरों, जंगलों या फिर रिजर्व पार्कों के नीचे हैं. उसे निकालना पर्यावरण के लिहाज से भी ठीक नहीं.
कोयला खदानों में नियम भी ताक पर
भारत में अब भी 30 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है. करोड़ों लोगों को दिन में कुछ ही घंटे बिजली मिल पाती है. देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 234 गीगावॉट है. इसमें कोयला प्लांटों की हिस्सेदारी 59 फीसदी है. भारत 2017 तक कोयले से और 70 गीगावॉट बिजली बनाना चाहता है लेकिन इसके लिए फिलहाल निवेशक नहीं मिल रहे हैं.
भारतीय रिजर्व बैंक भी विदेशों से कोयला खरीदने पर अलार्म बजा चुका है. आरबीआई के मुताबिक कोयला आयात की वजह से देश को 18 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है.
सरकार से सहायता
सौर ऊर्जा के विकास में सरकार की योजनाएं भी सहायक साबित हो रही हैं. सौर ऊर्जा योजनाओं को जल्द प्रशासनिक अनुमति मिल रही है. छह से 12 महीने के भीतर बिजली बनाने का काम शुरू हो जा रहा है. इसके उलट कोयला पावर प्लांट को तैयार करने में करीब आठ साल लग जाते हैं. सरकारी सब्सिडी की वजह से भी सौर ऊर्जा सस्ती पड़ रही है. सौर ऊर्जा से बनी बिजली जहां सात रुपये किलोवॉट घंटा पड़ती है, वहीं कोयले की बिजली की लागत 5-6 रुपये किलोवॉट घंटा है.
विशेषज्ञों को लगता है कि भारत 2022 तक वैकल्पिक स्रोतों से 15 फीसदी बिजली बनाने के लक्ष्य को आराम से पार कर जाएगा. फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के सीनियर डायरेक्टर विवेक पंडित कहते हैं, "कोयले की कमी है. निवेशक चिंता में है. अगर भारत में कोयला कम पड़ा तो ऊर्जा संकट होगा. इसका असर औद्योगिक विकास पर पड़ेगा."
गुजरात में सौर ऊर्जा के बड़े प्लांट
पर्यावरण को भी फायदा
सौर और पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों से पर्यावरण को भी फायदा है. भारत में प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है. 2005 से 2012 के बीच देश मेंसल्फर डाय ऑक्साइड (एसओटू) का उत्सर्जन 60 फीसदी बढ़ा है. इसके चलते अम्लीय वर्षा और सांस संबंधी बीमारियां बढ़ी हैं. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को आंकड़ों के मुताबिक एसओटू के उत्सर्जन के मामले में भारत अमेरिका को पीछे छोड़ चुका है. चीन के बाद भारत इस दूषित गैस का दूसरा बड़ा उत्सर्जक है.
सिडनी का आर्क्स इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट हरित ऊर्जा नाम का फंड चलाता है. संस्थान के विश्लेषक टिम बाकले के मुताबिक भारत को जल्द कोयले के रास्ते से हटाना होगा, वरना उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. सौर ऊर्जा योजनाएं बाकले में कुछ उम्मीदें जगाती हैं, "यह एक बुरा समय है लेकिन हमेशा सुबह से पहले अंधेरा होता है."
ओएसजे/एमजे (एपी)sabhar :http://www.dw.de/

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