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बुधवार, 12 जुलाई 2023

भारत गौरव हिमरू हस्तशिप फैब्रिक! मशरू और हिमरू हस्तशिप फैब्रिक

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भारत के हर हिस्से में एक अलग संस्कृति और विविधता नज़र आती है और यही हमारे देश को दुनिया से अलग बनाती हैं। भारत देश की इसी सांस्कृतिक विरासत में शामिल है औरंगाबाद का मशरू और हिमरू हस्तशिप फैब्रिक! मशरू और हिमरू की उत्पत्ति महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के औरंगाबाद जिले से हुई और एक समय इनका उपयोग केवल रईसों के कपड़े बनाने के लिए किया जाता था। इन्हें तैयार करने के लिए कपास और रेशम को एक विशेष करघे के उपयोग से एक साथ बुना जाता है, जिससे ये खास तरह का फैब्रिक बनता है.. जो बहुत ही कोमल और खूबसूरत होता है। पुराने समय में इसमें सोने और चांदी के तारों का उपयोग किया जाता था। धागे इतने पतले और महीन होते थे कि पूरा कपड़ा सोने के कपड़े का आभास देता था। हिमरू को 'किम ख्वाब' के नाम से भी जाना जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, इन दोनों कलाओं का मूल फ़ारसी है। ऐसा माना जाता है कि यह कला औरंगाबाद में तब आई जब 14वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से औरंगाबाद स्थानांतरित की। लेकिन जब सम्राट ने अपनी राजधानी वापस दिल्ली स्थानांतरित कर दी तो कई बुनकर औरंगाबाद में ही रुक गए। क्योंकि मशरू और हिमरू बहुत अनोखे और अलग मटेरियल हैं, इसलिए ये कपड़े शाही परिवार के सदस्यों और अन्य बड़े लोगों द्वारा बहुत पसंद किए गए। उस समय इसकी प्रसिद्धि का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि मार्को पोलो जब एशिया में मीलों लंबे फ़ासले पार कर दक्कन पहुंचा था, तो स्वागत में उसे हिमरू की शॉल भेंट की गई थी। उस शॉल की नफ़ासत का ज़िक्र करते हुए मार्को पोलो ने अपने संस्मरण में लिखा था- "वो शॉल इतनी नाज़ुक और बारीक बुनाई वाली थी, मानो मकड़ी का महीन जाला हो। कोई भी अपने कलेक्शन में उसे रखना चाहेगा।”

दुखद यह है कि राजे–रजवाड़ों के सिमटने, नवाबों के दौर पलटने के साथ जो हश्र दूसरी कई कलाओं-शिल्‍पों का हुआ, वही हाल इस कला का भी हुआ। आज यह कला लगभग लुप्त होने के कगार पर है। लेकिन रोशनी की किरण हैं औरंगाबाद के कई ऐसे कारीगर जो इसे ज़िंदा रखे हुए हैं। क्या आप कपड़े बुनने की इस कला के बारे में जानते थे? हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। sabhar batar India facebook wall


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