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शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

मस्तिष्क एक रहस्यमयी यात्रा पर

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 क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब भी आपका मस्तिष्क एक रहस्यमयी यात्रा पर होता है? एक ऐसी यात्रा, जो जागृत संसार से परे, आपके अवचेतन मन (Subconscious Mind) के गहरे गलियारों में प्रवेश करती है। इस रहस्य की चाबी छुपी है मेलाटोनिन में—वह दिव्य रसायन, जो न केवल शरीर को विश्राम देता है, बल्कि आत्मा को भी ज्ञान, अंतर्ज्ञान और आध्यात्मिक जागरण के द्वार तक ले जाता है।


विज्ञान इसे नींद का हार्मोन कहता है, परंतु शास्त्रों में इसे ‘आज्ञाचक्र का अमृत’ कहा गया है। यह वह पुल है, जो बाहरी संसार से हमें भीतर की रहस्यमयी दुनिया तक पहुँचाता है—वह जगह, जहाँ आपके विचार, भावनाएँ और छुपे हुए संस्कार संचित होते हैं।


आधुनिक न्यूरोसाइंस की दृष्टि से देखें, तो मेलाटोनिन मस्तिष्क की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) को नियंत्रित करता है और शरीर को गहरी नींद के लिए तैयार करता है। लेकिन इसके प्रभाव यहीं खत्म नहीं होते! यह गहरी निद्रा के दौरान हमारे अवचेतन मन को सक्रिय करता है, जहाँ स्मृतियाँ संचित होती हैं, विचारों की सफाई होती है और मानसिक ऊर्जाओं का पुनर्निर्माण होता है।


जब मेलाटोनिन पर्याप्त मात्रा में स्रावित होता है, तब हमारा मस्तिष्क REM (Rapid Eye Movement) स्लीप में प्रवेश करता है—यानी वह अवस्था, जहाँ सपने जन्म लेते हैं। यह सपने केवल कल्पनाएँ नहीं, बल्कि हमारे अवचेतन मन की गहराइयों से आने वाले संदेश होते हैं, जिन्हें सही तरीके से समझा जाए, तो वे हमारे भविष्य के संकेत भी दे सकते हैं!


अब जरा योग शास्त्रों की ओर बढ़ते हैं। हिंदू दर्शन में पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) को ‘आज्ञाचक्र’ कहा गया है, जो तीसरी आँख का प्रतीक है। यही वह केंद्र है, जहाँ आत्मा और ब्रह्मांड के बीच का संचार स्थापित होता है।वेदांत और योग के अनुसार, यह अंग हमारे भीतर की दिव्य चेतना से जुड़ा हुआ है और यही वह स्थान है जहां हमारी आत्मा और ब्रह्मा का मिलन होता है। इस संदर्भ में, मेलाटोनिन को भी एक दिव्य स्राव के रूप में देखा जाता है, जो हमारे भीतर शांति और जागरूकता का संचार करता है।


जब ध्यान और साधना के द्वारा आज्ञाचक्र को सक्रिय किया जाता है, तो मेलाटोनिन का प्रवाह बढ़ता है, और साधक को गहरी शांति, अंतर्ज्ञान और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं। इसे ही आध्यात्मिक जागरण (Spiritual Awakening) कहा जाता है।


भगवद गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—

"ध्यानयोगेन संयुक्तो मद्भावं आगता:।"

(जो ध्यान में लीन होता है, वह मेरी चेतना से एकाकार हो जाता है।)


यानी जब साधक अपने अवचेतन को नियंत्रित कर लेता है, तब वह संसार की सीमाओं से परे आत्मज्ञान के द्वार तक पहुँच सकता है।

साभार फेसबुक 

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