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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

हरियाणा के 'रोबो' की गूगल मेले में धूम

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बोल न पाने वाले लकवाग्रस्त मरीज़ों के लिए सस्ता कम्युनिकेशन सिस्टम बनाने वाले हरियाणा के 16 वर्षीय छात्र क्लिक करेंअर्श शाह उर्फ 'रोबो'को चर्चित गूगल साइंस फ़ेयर में फाइनलिस्ट चुना गया है.
दुनिया की क़रीब डेढ़ प्रतिशत आबादी पार्किन्सन, एएलएस जैसी बीमारियों से ग्रस्त है जिनमें वे आम लोगों जैसी बातचीत नहीं कर पाते हैं.

पानीपत में बारहवीं के छात्र और रोबोटिक्स के शौकीन अर्श का दावा है कि वे मशीनें काफ़ी बड़ी और महंगी होती हैं. लोगों को सस्ता विकल्प उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने ये लोग संवाद के लिए अपनी सांसों के इशारे को समझने वाली डिवाइसों पर निर्भर करते हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी को बताया, “टॉक पॉकेट में फिट हो जाती है और इसकी क़ीमत पांच से सात हज़ार के बीच है. आमतौर पर ऐसी दूसरी डिवाइसों के लिए लाखों चुकाने पड़ते हैं.”

कैसे काम करता है टॉक?

अर्श के अनुसार, ‘टॉक’ एक ब्रेथ सेंसर के साथ जुड़ा होता है, जो मरीज़ के कान पर फिट होता है और उसका सेंसर ठीक नाक के नीचे पहुंचता है.
मरीज़ ‘मोर्स कोड’ के आधार पर अपने सांसों की तीव्रता और पैटर्न के ज़रिए इनपुट दर्ज़ करते हैं.
टॉक इन इशारों को ऑडियो संदेशों में बदल देता है. जिन वाक्यों का प्रयोग अक्सर किया जाता हो उनके लिए शॉर्टकोड भी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस डिवाइस से उन मरीज़ों को फ़ायदा होगा, जो किसी बीमारी की वजह से बोल या हिल-डुल नहीं सकते हों.

बाज़ार में कब आएगा टॉक?

इस डिवाइस को लोगों तक पहुंचाने के लिए अर्श ने ‘क्राउड फंडिंग’ का रास्ता चुना है और उनके अनुसार मार्च 2015 तक टॉक बाज़ार में आ जाएगा.
साइंस फेयर के लिए गूगल ने दुनियाभर से 15 फाइनलिस्टों को चुना है जिनमें एशिया से अकेले अर्श चुने गए हैं.
क्लिक करेंगूगल साइंस फ़ेयर 2014 के विजेता की घोषणा सितंबर में की जाएगी.

विजेता को पचास हज़ार डॉलर की स्कॉलरशिप और गैलापगोस, वर्जिन गैलेक्टिक स्पेसपोर्ट में घूमने का मौका मिलेगा. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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